परिचय
मीराबाई (1498–1546) भक्तिकाल की सगुण काव्यधारा (कृष्णभक्ति शाखा) की अमर कवयित्री और साधिका थीं, जिनका जन्म मेड़ता (राजस्थान) के राजघराने में हुआ था। सांसारिक सुखों, सामाजिक रूढ़ियों और राजमहलों के वैभव को त्यागकर उन्होंने गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण) को ही अपना सर्वस्व और पति स्वीकार किया। उनके गाए भक्ति पद और भजन विरह की तीव्र पीड़ा, अनन्य समर्पण, सरलता और माधुर्य रस की अद्भुत मिसाल हैं। राजस्थानी, ब्रज और गुजराती भाषा के सुंदर समन्वय से रचे गए उनके पद आज भी सदियों बाद जन-जन के हृदय में बसे हैं।
मीराबाई के प्रमुख पद व भजन (अर्थ एवं व्याख्या सहित)
- हे री मैं तो प्रेम दिवानी / मीराबाई
- जोगिया री प्रीतड़ी है दुखड़ा रों मूल / मीराबाई
- हरि बिन कूण गति मेरी / मीराबाई
- बसो मेरे नैनन में नंदलाल / मीराबाई
- चालाँ वाही देस / मीराबाई
- लगी मोहि राम खुमारी हो / मीराबाई
- मीरा के पद (भावार्थ सहित)
- मीरा के पद (NCERT विशेष व्याख्या)
- राणाजी म्हें तो गोविंद का गुण गास्याँ / मीराबाई
- भोर और बरखा / मीराबाई
- नहिं भावै थारो देसलड़ो रंगरुड़ो / मीराबाई
- श्रीराधे रानी दे डारो बाँसुरी मोरी / मीराबाई
- मैं गिरधर के घर जाऊँ / मीराबाई
- दरस बिन दूखन लागे नैन / मीराबाई
- मैंने नाम रतन धन पायौ / मीराबाई
- स्याम! मने चाकर राखो जी / मीराबाई
- जोगी मत जा मत जा मत जा / मीराबाई
- कोई कहियौ रे प्रभु आवन की / मीराबाई
- श्री गिरधर आगे नाचूँगी / मीराबाई
- राणाजी मुझे यह बदनामी लगे मीठी / मीराबाई
- म्हाँरे घर आज्यो प्रीतम प्यारा / मीराबाई
- बादल देख डरी हो / मीराबाई
- आली री मेरे नैणाँ बाण पड़ी / मीराबाई
- पपइया रे पिव की बाणि न बोल / मीराबाई
- राणाजी थें जहर दियौ म्हे जाणी / मीराबाई
- सखी मेरी नींद नसानी हो / मीराबाई
- मीराबाई का जीवन परिचय (Meera Bai Parichay)