परिचय
कविवर पद्माकर (1753–1833) रीतिकाल के अंतिम चरण के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली आचार्य कवि माने जाते हैं। उन्होंने अपने काव्य में श्रृंगार, वीर और भक्ति रस का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत कर ब्रजभाषा साहित्य को चरम उत्कर्ष पर पहुँचाया। अनुप्रास की सहज छटा, बिंब-विधान और होली-फाग व प्रकृति के सजीव वर्णन उनके कवित्त और सवैयों की प्रमुख पहचान हैं। ‘हिम्मतबहादुर विरुदावली’, ‘जगतविनोद’ और ‘गंगा लहरी’ जैसी अमर कृतियों ने उन्हें हिंदी साहित्य में कालजयी स्थान दिलाया।
पद्माकर का काव्य : सवैया एवं कवित्त संग्रह
📜 विषय-सूची — पद्माकर का काव्य
- पद्माकर के सवैया सवैया
- ऐसी न देखी सुनी सजनी
- आयी हौं खेलन फाग इहाँ
- फाग के भीर अभीरन में गहि
- या अनुराग की फाग लखौ जहँ
- राम को नाम जपो निसि-बासर
- गोकुल के कुल को तजि कै
- भूख लगे तब देत है भोजन
- आपहि आप पै रूसि रही
- फहरे निसान दिसानि ज़ाहिर
- पद्माकर के कवित्त कवित्त
- तीर पर तरनि-तनूजा के तमाल-तरे
- कूलन में केलिन कछारन में कुंजन में
- औरै भांति कुंजन में गुंजरत भौंर-भीर
- चंचला चमाकैं चहूँ ओरन तें चाह-भरी
- अधखुली कंचुकी उरोज अध-आधे खुले
- गुलगुली गिल मैं ग़लीचा है गुनीजन हैं
- झिलत झकोर रहै जीवन को ज़ोर रहै
- आज बरसाने की नबेली अलबेली बधू
- देव नर किन्नर कितेक गुन गावत
- ए हो नंदलाल ऐसी व्याकुल परी है बाल