परिचय
सरहपा (सरहपाद) 8वीं शताब्दी के प्रमुख वज्रयानी सिद्ध और सहजिया परंपरा के आरंभिक कवियों में माने जाते हैं। उनका संबंध नालंदा, बिहार से माना जाता है। वे बौद्ध सिद्ध परंपरा के उन संत कवियों में थे, जिन्होंने बाहरी आडंबर और कर्मकांड के बजाय सहज साधना, आत्मबोध और गुरु के महत्व पर जोर दिया। उनकी रचनाएँ अपभ्रंश और प्राचीन लोकभाषा के निकट भाषा में मिलती हैं, जिन्हें हिंदी साहित्य की आरंभिक काव्यधारा के विकास में महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके पदों में सहज जीवन, साधना और रूढ़ धार्मिक मान्यताओं पर तीखा व्यंग्य दिखाई देता है।
सरहपा के प्रसिद्ध पद व दोहे
- जहि मण पवण ण संचरइ / सरहपा
- अरे बढ़ सहज गइ पर रज्जह / सरहपा
- देक्खउ सुणउ पईसउ साद्दउ / सरहपा
- एथु से सरसइ सोवणाह / सरहपा
- जहि मण मरइ / सरहपा
- मन्त ण तन्त ण धेअ ण धारण / सरहपा
- षट् दर्शन−खंडन / सरहपा