परिचय
मैथिल कोकिल महाकवि विद्यापति (लगभग 1352–1448) मैथिली, अवहट्ठ और संस्कृत के अप्रतिम कवि, संगीतकार व पदकार थे। उनका जन्म बिहार के मिथिला क्षेत्र (मधुबनी) के बिस्फी गाँव में हुआ था। विद्यापति ने राधा-कृष्ण के अलौकिक प्रेम, नख-शिख शृंगार के साथ-साथ शक्ति (भगवती) और शिव (नचारी व महेशवाणी) के भक्ति गीतों को अमर बना दिया। उनकी गेय पदावली और माधुर्यपूर्ण लोक-भाषा ने हिंदी व मैथिली साहित्य को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया।
विद्यापति के प्रसिद्ध पद और गीत
- हे जननी आहाँ जन्म सुफल करु / विद्यापति
- भगवती चरनार बन्दिति की महा महिमा निहारु / विद्यापति
- कोने फूल फूलनि माँ के आधी-आधी रतिया / विद्यापति
- दया करु एक बेर हे माता / विद्यापति
- गे अम्मा बुढ़ी मईया / विद्यापति
- सबरी के अंगना में साधु-संत अयलखिन्ह / विद्यापति
- सीताराम सँ मिलान कोना हैत / विद्यापति
- तीलक लगौने धनुष कान्ह पर टूटा / विद्यापति
- चैत मास गृह अयोध्या त्यागल / विद्यापति
- चानन रगड़ि सुहागिनी हे गेले फूलक हार / विद्यापति
- भजु राधे कृष्णा गोकुल में अबध-बिहारी / विद्यापति
- हरी के मोहनी मुरतीया में मोन लागल हे सखी / विद्यापति
- जनम भूमि अछि मिथिला सम्हारु हे माँ / विद्यापति
- बारह बरष पर काली जेती नैहर / विद्यापति
- सासु रुसल मैया हम्मर काली एली काली / विद्यापति
- दिय भक्ति के दान जगदम्बे हम जेबै कतइ हे अम्बे / विद्यापति
- क्यों देर करती श्रीभवानी मैं तो बुद्धिक हीन हे माँ / विद्यापति
- लाले-लाले आहुल के माला बनेलऊँ / विद्यापति
- कनक-भूधर-शिखर-बासिनी / विद्यापति
- इनती करै छी भैरवनाथ / विद्यापति
- इनती करै छी हे ब्राह्मण मिनती करै छी / विद्यापति
- सबरी के बैर सुदामा के तण्डुल / विद्यापति
- साओनर साज ने भादवक दही / विद्यापति
- ई दिन बड़ दुर्लभ छल सजनी गे / विद्यापति
- तरुणि बयस मोही बीतल सजनी गे / विद्यापति
- लट छल खुजल बयस सजनी गे / विद्यापति
- फरल लवंग दूपत भेल सजनी गे / विद्यापति
- नव जौबन नव नागरि सजनी गे / विद्यापति
विद्यापति के दोहे एवं षटपदी
अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ एवं गीत संग्रह
- बारहमासा / विद्यापति
- गंगा-स्तुति / विद्यापति
- भगवती गीत / विद्यापति
- अभिसार / विद्यापति
- रूप-गौरव / विद्यापति
- वसन्त-चुमाओन / विद्यापति
- बसंत-शोभा / विद्यापति
- बटगमनी / विद्यापति
- गीत संग्रह / विद्यापति
- विबाहक गीत / विद्यापति
- बिरह गीत / विद्यापति
- भूइयां के गीत / विद्यापति
- भगवान गीत / विद्यापति
- भगता गीत / विद्यापति
- बिसरही गीत / विद्यापति
- जाइत देखलि पथ नागरि सजनि गे / विद्यापति
- दुहुक संजुत चिकुर फूजल / विद्यापति
- जाइत पेखलि नहायलि गोरी / विद्यापति
- रति-सुबिसारद तुहु राख मान / विद्यापति
- ससन-परस रबसु अस्बर रे देखल धनि देह / विद्यापति
- जखन लेल हरि कंचुअ अचोडि / विद्यापति
- सैसव जौवन दुहु मिल गेल / विद्यापति
- आदरें अधिक काज नहि बंध / विद्यापति
- अयलऊँ हे बड़का बाबा / विद्यापति
- मचिये बैसल तोहें राजा हेमन्त ॠषि / विद्यापति
- चोआ चानन अंग लगाओल कामीनि कायल किंशगार / विद्यापति
- हई कुसुम बेली चढ़ई ताके मईया गे सुरेसरी / विद्यापति
- अगहन दिन उत्तम सुख-सुन्दर घर-घर सारी / विद्यापति
- कोने लोक आहे भूईयां लकड़ी चुनै छी आहे राम / विद्यापति
- सखी हम जीबन कोना कटबई / विद्यापति
- प्रीतम हमरो तेजने जाइ छी परदेशिया यौ / विद्यापति
- लोचन धाय फोघायल / विद्यापति
- सरसिज बिनु सर सर / विद्यापति
- अभिनव कोमल सुन्दर पात / विद्यापति
- अभिनव पल्लव बइसंक देल / विद्यापति
- सजनी कान्ह कें कहब बुझाइ / विद्यापति
- माधव ई नहि उचित विचार / विद्यापति
- ए धनि माननि करह संजात / विद्यापति
- चन्दा जनि उग आजुक / विद्यापति
- अम्बर बदन झपाबह गोरि / विद्यापति
- नन्दनक नन्दन कदम्बक / विद्यापति
- कामिनि करम सनाने / विद्यापति
- आजु दोखिअ सखि बड़ / विद्यापति
- कि कहब हे सखि रातुक / विद्यापति
- सामरि हे झामरि तोर दहे / विद्यापति
- आहे सधि आहे सखि / विद्यापति
- कुंज भवन सएँ निकसलि / विद्यापति
- कंटक माझ कुसुम परगास / विद्यापति
- प्रथमहि सुंदरि कुटिल कटाख / विद्यापति
- कान्ह हेरल छल मन बड़ साध / विद्यापति
- कुच-जुग अंकुर उतपत् भेल / विद्यापति
- सखि कि पुछसि अनुभव मोय / विद्यापति
- चानन भेल विषम सर रे / विद्यापति
- के पतिआ लय जायत रे / विद्यापति
- जौवन रतन अछल दिन चारि / विद्यापति
- आसक लता लगाओल सजनी / विद्यापति
- भजै छी तारिणी सब दिन कियै छी दृष्टि के झपने / विद्यापति
- पहिल बदरि कुच पुन नवरंग / विद्यापति
- मानिनि आब उचित नहि मान / विद्यापति
- आदरे अधिक काज नहि बन्ध / विद्यापति
- परतह परदेस, परहिक आस / विद्यापति
- बड़ि जुड़ि एहि तरुक छाहरि / विद्यापति
- हम एकसरि, पिअतम नहि गाम / विद्यापति
- आजु नाथ एक व्रत / विद्यापति
- सासु जरातुरि भेली / विद्यापति
- नव यौवन अभिरामा / विद्यापति
- हम जुवती, पति गेलाह बिदेस / विद्यापति
- बड़ अजगुत देखल तोर / विद्यापति
- जगत विदित बैद्यनाथ / विद्यापति
- गौरी के वर देखि बड़ दुःख / विद्यापति
- उचित बसए मोर / विद्यापति
- माधव हम परिणाम निराशा / विद्यापति
- माधव कत तोर / विद्यापति
- सुनु रसिया अब न बजाऊ / विद्यापति
- सखि हे हमर दुखक नहिं ओर / विद्यापति
- चाँद-सार लए मुख घटना करू / विद्यापति
- सुनु रसिया / विद्यापति
- सखि हे, कि पुछसि अनुभव मोए / विद्यापति
- मोरा रे अँगनमा चानन केरि गछिया / विद्यापति
- भल हर भल हरि भल तुअ कला खन / विद्यापति
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
विद्यापति को "मैथिल कोकिल" क्यों कहा जाता है?
विद्यापति की भाषा अत्यंत मधुर, सरस और संगीतमय थी। कोयल जैसी मीठी वाणी और सुरीले मैथिली पदों की रचना के कारण उन्हें आदर से "मैथिल कोकिल" कहा जाता है।