परिचय
बैजू (बैजू बावरा) 15वीं शताब्दी के महान संगीतज्ञ, ध्रुपद गायक और मध्यकालीन भारतीय संगीत परंपरा के अमर साधक माने जाते हैं। उनका ऐतिहासिक संबंध चंदेरी (मध्य प्रदेश) से जुड़ा है। वे ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर की संगीत सभा के प्रमुख रत्न थे और उन्होंने ध्रुपद गायन शैली को परिष्कृत कर जनमानस में लोकप्रिय बनाया। उनके पदों में नाद-ब्रह्म की साधना, भक्ति, प्रकृति-सौंदर्य और शास्त्रीय राग-रागिनियों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
बैजू बावरा के प्रमुख पद व ध्रुपद रचनाएँ
- फागुन गढ़ जो बनाई सखियाँ / बैजू बावरा
- प्यारे तू ही ब्रह्मा तू ही विष्नु / बैजू बावरा
- सुंदर मृगनैनी कामिनी / बैजू बावरा
- जागत भोरहि जोति स्वरूप / बैजू बावरा
- तू आदि भवानी जग जानी सर्वानी / बैजू बावरा
- आज लखी सखि मनमोहिनी मूरत / बैजू बावरा
- मोहन जागौ मनोहर मधुसूदन मदनमोहन / बैजू बावरा
- जै काली कल्यानी खप्परधारनी / बैजू बावरा
- प्रथम आदि सिव-सक्ति / बैजू बावरा
- बंसीधर पिनाकधर, गिरवरधर गंगाधर / बैजू बावरा
- दसहरा मुबारिक होय तुमकौं / बैजू बावरा
- आज सुपने में साँवरी सलौनी सूरत देखी / बैजू बावरा
- संसाक तारन तू ही विधाता / बैजू बावरा
- अचल राज करौ, कोटि बरस लौं चिरंजीव रहौ / बैजू बावरा
- नाम में रूप, नाम में विद्या / बैजू बावरा
- प्रथम नाम गनेस कौ लीजियै / बैजू बावरा
- इंद्र हू की असवारी / बैजू बावरा
- तान गजराज ज्ञान कीनौ महावत / बैजू बावरा
- कर पै गुलफ धरैं तिय दुचित अनमनी / बैजू बावरा
- कुंजन मधि रच्यौ रास / बैजू बावरा
- तोसौं लागि रहे पिय सुंदरी / बैजू बावरा
- बावरे के संग-साथ बावरी सी भई मैं / बैजू बावरा
- सुंदर अति नवीन प्रवीन महा चतुर / बैजू बावरा
- जोगी जगी सती संन्यासी अवधूत / बैजू बावरा
- प्यारे बिन भर आये दोऊ नैन / बैजू बावरा
- समझ सोच लै मूरख निदान रे / बैजू बावरा
- हरि नाम बोल लै सुगाना / बैजू बावरा
- नाद ब्रह्म कौ अगाध ब्यौरो जानत / बैजू बावरा