परिचय
स्वामी बिहारिनिदेव जी (17वीं शताब्दी) भक्तिकाल की सखी (हरिदासी) संप्रदाय परंपरा के अत्यंत प्रतिष्ठित संत-कवि एवं संगीतज्ञ थे। वे संगीत शिरोमणि स्वामी हरिदास जी के प्रमुख शिष्यों की परंपरा में आते हैं और उन्होंने निधिवन के नित्य निकुंज रस को अपनी वाणी का केंद्र बनाया। इनके पदों में श्री राधा-कृष्ण (श्यामा-कुंजबिहारी) की युगल छवि, केली-विलास, वृंदावन वास की महिमा और अनन्य निष्ठा का अत्यंत मधुर एवं गूढ़ चित्रण मिलता है। ब्रजभाषा के गेय पदों में रचित इनकी 'बिहारिनिदेव जी की बानी' भक्ति साहित्य और शास्त्रीय संगीत की अनमोल धरोहर है।
स्वामी बिहारिनिदेव जी के पद एवं प्रमुख रचनाएँ
- स्यामाजू के सरन जे सुख न सिराने / बिहारिनिदेव
- हरि भली करी प्रभुता न दई / बिहारिनिदेव
- हरि जस गावत सब सुधरे / बिहारिनिदेव
- बसिबौ श्रीवृंदावन कौ नीकौ / बिहारिनिदेव
- याते मोहि कुंजबिहारी भाए / बिहारिनिदेव
- जोरी अद्भुत आज बनी / बिहारिनिदेव
- ह्वै है प्रीति हीं परतीति / बिहारिनिदेव
- हरि बिन कूकर सूकर हुवैं हौ / बिहारिनिदेव
- परि गइ कौनहुँ भाँति / बिहारिनिदेव
- हरि पथ चलहु न साँझ सबेरौ / बिहारिनिदेव
- ताते भजन स्याम करि लीजै / बिहारिनिदेव