परिचय
गोस्वामी हरिराय जी (1590–1727) पुष्टिमार्गीय वल्लभ संप्रदाय के मूर्धन्य आचार्य, संत और उच्च कोटि के कृष्णभक्त कवि थे। उनका संबंध गोकुल (उत्तर प्रदेश) से था तथा उन्होंने पुष्टिमार्गीय सेवा पद्धति, भक्ति सिद्धांतों और चौरासी वैष्णवन की वार्ता के भावात्मक विस्तार में ऐतिहासिक योगदान दिया। इनकी रचनाओं में भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, वात्सल्य, भ्रमरगीत और निकुंज लीलाओं का अत्यंत सूक्ष्म व सरस वर्णन मिलता है। ब्रजभाषा के मधुर और गेय पदों के माध्यम से उन्होंने वैष्णव साहित्य को अद्वितीय समृद्धता प्रदान की।
गोस्वामी हरिराय जी के पद एवं रचनाएँ
- झूलौ पालने नंद नंदा / गोस्वामी हरिराय
- नंदराय के भवन बधाई / गोस्वामी हरिराय
- दोऊ भया घुटुरुवन चलत / गोस्वामी हरिराय
- आवैगी मेरी बलाय / गोस्वामी हरिराय
- दूलह दुलहिन अधिक बनी / गोस्वामी हरिराय
- यह विधि सचु सों रैनु बिहानी / गोस्वामी हरिराय
- मधुकर! करहु और कछु बात / गोस्वामी हरिराय
- मधुकर! करिवे में कहा राखी / गोस्वामी हरिराय