संत पीपाजी महाराज मध्यकालीन भारत के प्रसिद्ध संत, भक्त और समाज-सुधारक थे। वे निर्गुण भक्ति परंपरा से जुड़े संत माने जाते हैं और उनका संबंध राजस्थान के गागरोन से माना जाता है। उन्होंने बाहरी आडंबरों के बजाय ईश्वर-भक्ति, सदाचार और मानव समानता पर बल दिया। उनके विचारों का प्रभाव राजस्थान सहित उत्तर भारत की भक्ति परंपरा में देखा जाता है।
संत पीपाजी के सबद और शब्द
- एक अचंभा अैसा देख्या
- संतो एक राम सब माही
- जियरा करि रे कोई उपाया
- देव भ्रमतौ-भ्रमतौ तेरै सरनै आयौ
- जै कलि नाम कबीर न होते
- बहुरि बसिरै पाहुणा
- राम तेरी भूखा भक्ति न होई
- साधो ब्रह्म अलख लखाया
- भगति तेरी जीवनि मेरी
- तूँ मेरा तरवर मैं जन पांखी
- इण घट अंदर बाग बगीचा
- सुकरि मैरो मन अनंत न जाई
- भगवंत नहिं भजन होई
- मन आप दरसाया
- माधवे नट विद्या मांडी
- तू मेरे तीरथ तूँ मेरे कासी
- तैं प्रभु मो सूं बहुत करी
- भाई रे राम अमल मेरा मन राता
- देसड़ लौं बिड़ाणौ रे जीवड़ा
- अनत न जाऊँ राजा राम की दुहाई
- पूजा कौण करो जगजीवन
- देवा नटवर गति नाचि गए
- मन रै कहाँ भूलौ मति हीणा
- तो जी जै गोव्यंद चरना
- देसड़ लौं बिड़ाणौ रे जीवड़ा
- प्रीत की रीति अनोखी जानौ
- देव भ्रमतौ-भ्रमतौ तेरै सरनै आयौ
- क्या तेरा क्या मेरा मनाँ
- सोई दिन सांचा जा दिन संत मिलाई
- जै कलि नाम कबीर न होते
- जियरा करि रे कोई उपाया
- हरि को मर्म न कोई जाणै
- साधो ब्रह्म अलख लखाया