खेती-बाड़ी करते हुए भक्ति का मार्ग अपनाने वाले धन्ना भगत (1415–1475) भक्तिकाल के संत-कवि थे। राजस्थान के टोंक क्षेत्र से उनका संबंध माना जाता है और उन्हें स्वामी रामानंद के शिष्यों में गिना जाता है। धन्ना की भक्ति में किसी जटिल साधना के बजाय ईश्वर के प्रति सीधा विश्वास, नाम-स्मरण और निष्कपट समर्पण दिखाई देता है। वे जातिगत ऊँच-नीच तथा बाहरी आडंबरों से अधिक मन की श्रद्धा को महत्व देते थे।
धन्ना भगत की वाणी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गुरु ग्रंथ साहिब में सुरक्षित है। उनके सबदों में प्रभु-स्मरण, दीनता और सच्ची भक्ति का आग्रह मिलता है। किसान के जीवन और संत-चिंतन का यह मेल धन्ना की काव्य-परंपरा को विशिष्ट बनाता है। उनके जीवन से जुड़ी कई लोककथाएँ भी प्रचलित हैं, हालांकि उनका ऐतिहासिक आधार अलग-अलग स्रोतों में समान नहीं मिलता।
धन्ना भगत जी के सबद
- गोपाल तेरा आरता
- ना जानौं राम कैसा जोगी
- भ्रमत फिरत बहुत जनम बिलाने
- हरि-हरि नित समरि उवरिसी
- जो जन तुमरी भगति करंते
- जग ते उधरे जिनि राम कहे
- रे चित चेतसि कीन दयाल
- हरि गुण गाइरे
- रे चित! च्यंतसि दीनदयालहि