बाबा रामदेवजी राजस्थान के प्रसिद्ध लोकदेवता हैं, जिनकी पूजा राजस्थान के साथ-साथ देश के कई हिस्सों में श्रद्धा से की जाती है। उनका प्रमुख तीर्थ रामदेवरा है, जिसे रूणीचा के नाम से भी जाना जाता है। लोकपरंपरा में वे रामसा पीर के नाम से भी पूजे जाते हैं और हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों समुदायों में उनके प्रति आस्था देखने को मिलती है। घोड़े पर सवार बाबा रामदेवजी की छवि राजस्थान की लोक-संस्कृति में विशेष पहचान रखती है।
रामदेवजी की लोकवाणी में भक्ति, मानवता, सामाजिक समानता और आडंबर-विरोध के विचार मिलते हैं। उनकी स्मृति से जुड़े हरजस, भजन और लोकगीत आज भी राजस्थान के गांवों में गाए जाते हैं। रामदेवरा में स्थित उनकी समाधि पर प्रतिवर्ष बड़ा मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। लोकविश्वास में उनके जीवन को जनकल्याण, दीन-दुखियों की सहायता और सामाजिक समरसता से जोड़ा जाता है।
बाबा रामदेवजी के सबद और लोकवाणी
- साधो भाई मूळ भेद विचारा
- सुणजो ग्यान गोष्ठी री बातां
- हां रे बीरा ओ संसार अथग जळ भरियौ
- देखो भाव भगति री बातां
- नाथ निकळंक देव कुण है
- तोई राणी निज धरम अधिकार है
- है दुरळभ साध कळू में पूरा
- रळमिळ रेवौ हेत सूं हालो
- साधो भाई संगत शरण आवै
- सुणलौ गुरु गम ग्यान निहारी
- दुर्लभ साध कळू में पूरा
- भायां देखो माया पद नै हेठो
- निज आनंद म्हें ओळख्यौ है जी
- देखो भायां जोग जुगत सुखदाई
- अवतार रामा लखो नामा
- ध्रुव लग पहुंच्या धणी नै ध्याया
- साधो भाई म्हें हूँ नेड़ै सूं नेड़ौ
- उण दिन आलम आवसी
- घोर-घोर शंख बाजसी
- अबै थां सांभळी जुग संत सारा
- अगलोड़ी रीत सही कर
- विषय रचाय साखी रहे सामिल
- अमर बधावो म्हारे होय रह्यौ
- भांगो भ्रांत भाव नै पाळौ