बिहार के धरकंधा से जुड़े संत दरिया साहब निर्गुण संत परंपरा के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने दरिया पंथ या मुक्ति पंथ की स्थापना की और साधना, आत्मज्ञान तथा सद्गुरु की महत्ता को अपने विचारों का आधार बनाया। उनकी दृष्टि में परम सत्ता किसी एक स्थान तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत में विद्यमान है। वे कबीर की संत परंपरा से गहरे प्रभावित थे और स्वयं को कबीर का अवतार मानते थे।
दरिया साहब की लगभग बीस रचनाओं का उल्लेख मिलता है। ‘दरियासागर’, ‘ज्ञानदीपक’, ‘ज्ञानस्वरोदय’, ‘ज्ञानरत्न’, ‘विवेकसागर’ और ‘शब्द’ उनके प्रमुख ग्रंथों में हैं। उनकी कविता में नाम-स्मरण, गुरु-भक्ति, माया, कर्म, मुक्ति और आत्मानुशासन जैसे विषय बार-बार आते हैं। हिंदी के साथ भोजपुरी, अवधी और खड़ी बोली का मिश्रित रूप उनकी भाषा को लोक के निकट बनाता है। हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों में उनके अनुयायी रहे, जिससे उनकी संत-वाणी की व्यापक सामाजिक पहुँच का भी पता चलता है।
दरिया साहब के सबद
- रे नर तोहीं केतिक धीरकारों
- बिहंगम कौन दिसा उड़ि जइहो
- प्रीतम प्रीति बसे दिल मेरो
- जग में संत भये कैसे भारी
- तेरो कपरा नहीं अनाज
- जग में मरन कहिये सांच
- रे नर ऐसा गुरु ना कीजै
- पंडित पढ़ि गुन भए बिलाई
- साधो नारि नैन सर बंका
- अवधू एह मुरदे का गाँव
- साधो धोखे सब जग मारा
- पंडित सांच कहे जग मारे
- बेद पढ़े का एह गुन पंडित
- धन्य सोई भक्ति अनुरागा
- मानुख जन्म है सुफल अनंदा
- तीर्थ बर्त कर्म रचि राखा
- बिहंगम बोलु बचन बनबासी
- अनुभव अनहद करै बिचारा
- सोइ सोहागिनि पिया रंग राती
- बेद कितेब कोरान गीता पढ़े
- बहुत पंसारी हाट में
- प्रेम की खेलि फुलेल सुगंध है
- सखि हे ध्रिग ध्रिग जिवन
- साधो सतगुर की बलिहारी
- साधो बांकी बात कही
- संतो नीके गहो सतनाम
- अवधू सब्दहि करो बिचारा
- पंडित बूझो सब्द बिचारी
- ज्ञान को घोड़ला सून्य में दौरिया