नागौर के हरनावा गाँव से जुड़ी रानाबाई राजस्थान की कृष्ण-भक्ति परंपरा की संत-कवयित्री थीं। उनका जन्म जाट परिवार में हुआ और वे संत चतुरदास की शिष्या मानी जाती हैं। मीरा के लगभग समकालीन रानाबाई ने राजस्थानी लोकभाषा में कृष्ण-प्रेम और भक्ति को अपने पदों का आधार बनाया।
उनकी रचनाओं में कहीं विरह की कसक है तो कहीं ठाकुर के प्रति आत्मीय पुकार सुनाई देती है। ‘ओ लाल थाने फाग खिलाऊँ’ जैसे पदों में कृष्ण के प्रति प्रेम का उल्लास मिलता है, जबकि कई सबदों में संसार की नश्वरता और हरि-स्मरण की ओर संकेत है। राजस्थान की संत-परंपरा में रानाबाई को प्रायः ‘राजस्थान की दूसरी मीरा’ भी कहा जाता है।
रानाबाई के सबद
- ए तो जाबाला ए बाई थारा
- करसण होर्यो रे बीरा
- रसना बाण पड़ी रटबा की
- वारी वारी वारी वारी
- कोई दिन साथणियां संग रमती
- म्हारो म्हारो करतांई जावै
- राना मगन होय जस गावै
- ओ म्हारा मनड़े रा ठाकुर
- राना री अरदास नाथ थासूं
- चली जात है नाव बहुत मझधार में
- पीव गया परदेस
- हरि बिमुखां नर जूण गमावै
- चूंदड़ मैली न होय म्हारी बाया
- उलझ मत, थोथा ओ पंपाल
- हरि चरणन बिन ठौड़ कठे