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दादू दयाल के सबद : Dadu Dayal Ke Sabad

2026-09-22 · Shabad / Sabad / सबद

दादू दयाल (1544–1603) भक्तिकाल के निर्गुण संत और दादू पंथ के प्रवर्तक थे। उनका जन्म अहमदाबाद में माना जाता है, जबकि राजस्थान उनकी प्रमुख कर्मभूमि बना। सांभर में साधना और उपदेश के बाद उनके आसपास शिष्यों का बड़ा समूह बना। जाति-पाँति, धार्मिक आडंबर और बाहरी भेदों से अलग हटकर वे प्रेम, दया, नाम-स्मरण और आत्मज्ञान को आध्यात्मिक जीवन का आधार मानते थे। उनके विचारों का प्रभाव आगे चलकर रज्जब, सुंदरदास, गरीबदास और बखना जैसे संतों पर भी दिखाई देता है।

दादू की काव्य-वाणी में दोहा, पद और सबद प्रमुख हैं। उनकी भाषा में ब्रज, राजस्थानी, खड़ी बोली तथा अन्य लोकभाषाओं के शब्द मिलते हैं। ‘दादू वाणी’ और ‘अंगवधू’ के रूप में उनकी वाणी का संकलन प्रसिद्ध है। प्रेम, विरह, गुरु, माया, जीव और परमात्मा के संबंध जैसे विषय उनकी कविता में बार-बार आते हैं। नरैना में 1603 में उनका देहावसान हुआ, जो बाद में दादू पंथ का प्रमुख केंद्र बना।

दादू दयाल जी के सबद

  1. मालिक मिहरवान करीम
  2. काहे रे मन राम बिसारे
  3. तहाँ मुझ कमींन की कौन चलावै
  4. राम सुनहु न बिपति हमारी हो
  5. मन रे राम बिना तन छीजै
  6. मोह्यो मृग देखि बन अंधा
  7. अजहूँ न निकसै प्राण कठोर
  8. कैसे जीविये रे, साईं संग न पास
  9. जियरा क्यों रहै रे
  10. सो दिन कबहूँ आवैगा
  11. रस के रसिया लीन भये
  12. सईयां तूं है साहिब मेरा
  13. क्या कीजै मनिषा जनम कौं
  14. मैं मैं करत सबै जग जावै
  15. खालिक जागो जियरा सोवै
  16. ऐसा मन अमोलिक भाई
  17. मन मूरिखा तैं क्या कीया
  18. सतसंगति मगन पाइये
  19. कौन जनम कहँ जाता है अरे भाई
  20. का जिवना का मरणा रे भाई
  21. संग न छाडौं मेरा पावन पीव
  22. जियरा काहे रे मूढ़ डोलै
  23. बिरहणि कौं सिंगार न भावै
  24. तैं मन मोह्यौ मोर रे
  25. नहिं मेलूँ राम नहिं मेलूँ
  26. इबै तौ मोहिं लागी बाइ

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