मंजुकेशी रीतिकाल की अलक्षित कवयित्री हैं, जिनके जीवन के बारे में विस्तृत ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध नहीं है। उनकी पहचान मुख्यतः पदों और सबदों के माध्यम से सामने आती है। रामभक्ति उनके काव्य का केंद्रीय पक्ष है, लेकिन केवल आराधना तक उनकी रचनाएँ सीमित नहीं रहतीं। मनुष्य के आचरण, आत्मचिंतन, प्रेम, विरह और साधना से जुड़े विचार भी उनमें दिखाई देते हैं। ‘आँगन में खेलत रघुराई’ और ‘जन हित राम धरत शरीर’ जैसे पदों में राम के प्रति अनुराग का स्वर मिलता है।
मंजुकेशी की भाषा में ब्रजभाषा की काव्यात्मकता और संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का सुंदर मेल है। कहीं वे मन को अपने भीतर झाँकने की सीख देती हैं, तो कहीं राम के स्वरूप और आध्यात्मिक अनुभव पर विचार करती हैं। ‘भावुक, भावमय भगवान’ तथा ‘राम-रहस के ते अधिकारी’ जैसे सबद उनके चिंतनशील पक्ष को सामने लाते हैं। उपलब्ध साहित्य के आधार पर उन्हें रीतिकाल की उन कम चर्चित कवयित्रियों में रखा जा सकता है, जिनकी रचनाएँ शोध की दृष्टि से विशेष रुचिकर हैं।
मंजुकेशी के प्रमुख सबद एवं पद सूची (List of Sabad)
- बारे जोगिया कवन बिपिन मँह डोलै
- संयम साँचो वाको कहिये
- भावुक, भावमय भगवान
- मानहु प्यारे, मोर सिखावन
- भावत रामहिं संयम इकरस
- जागहु पंथी भयउ बिहाना
- बिषयरस पान-पीक-सम त्याग
- भुवन-बिच एकै दीप जरै
- खेलत राम पूतरि माहिं
- चौरसी मठ के मठधारी
- हम न जाबैं कनक-गिरि-खोहा
- धाय धरो हरिचरण सबेरे
- देखेउ जो नीचे, हो रामा
- कब हरि सुमिरन में रस पैये
- मारे रहो, मन
- निर्मल मन को एक स्वभाव
- भावभोगी हमारे नयना
- कामद गिरि ढिग डेरा कीजै
- रामलगन माते जे रहते
- चेतहु चेतन बीर सबेरे
- रामधनी से हेत नहीं जो
- आपन रूप परखिये आपै
- अनुभव की बात कोउ-कोउ जानै
- जो चौदह रस को पहिचानै
- राम-रहस के ते अधिकारी
- शांति एक आधार सन्मुख
- सदय हृदय की सरस कहानी
- बाजी बँसुरिया हो रामा
- चार जुगनू झलाझल झमकै
- निर्मल मानसिक आवास
- दर्शक, दीप-दर्शन दूर
- छिन-सुख-लागि मानुष मरै
- गोसाईं मत, सुजन सगा सोइ आली
- चंचल मन को बस करिय
- जो मानै मेरी हित सिखवन
- कलि-प्रपंच-प्रसार, देखहु
- रे मन, देश आपन कौन
- भजन करिय निष्काम
- चतुर कहात, सुंदर