संत नामदेव (1270–1350) महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा के प्रमुख संत-कवि थे और वारकरी संप्रदाय से जुड़े थे। उनके गुरु बिसोवा खेचर माने जाते हैं। मराठी में उन्होंने अनेक अभंगों की रचना की, जबकि हिंदी में भी उनके पद और सबद मिलते हैं। उनकी वाणी में सगुण भक्ति के साथ निर्गुण चिंतन, गुरु-महिमा, नाम-स्मरण और ईश्वर की सर्वव्यापकता के भाव दिखाई देते हैं।
संत नामदेव जी के सबद
- जउ गुरदेउ त मिलै मुरारि
- अपुने रामहि भजु रे मन आलसीआ
- भैरऊ भूत सीतला धावै
- गहरी करिके नीब खुदाई
- माइ न होती बापु न होता
- हरि हरि करत मिटे सभि भरमा
- नर रामभजन बिन गत न तरन की
- घर की नारि तिआगै अंधा
- अणमड़िआ मंदलु बाजै
- मनु पंछीया मत्त पिंजरे
- दुध पीवोरे मेरे गोविंदराय
- लोभ लहरि अति नीझर बाजै
- मारवाड़ि जैसे नीरु बालहा
- पतिनपावन माधऊ बिरदु तेरा
- दस बैरागनि मोहि बसि
- जब देखा तव गावा
- नाद भ्रमे जैसे मिरगाए
- आदि, जुगादि जुगादि जुगो जुगु
- साहिबु संकटवै सेवकु भजै
- जौ राजु देहि त कवन बडाई
- सफल जनमु मो कउ गुर
- मन की बिरथा मनु ही जानै
- एक अनेक बिआपक पूरक