मध्व मुनीश्वर मराठी और हिंदी दोनों भाषाओं में रचना करने वाले भक्त कवि थे। उनका संबंध नासिक-त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र से बताया जाता है और वे मध्व संप्रदाय की वैष्णव पृष्ठभूमि से आए थे। बाद के समय में उनकी साधना और काव्य-दृष्टि का विस्तार संप्रदाय की सीमाओं से आगे दिखाई देता है। उनके पदों में कृष्ण-राम भक्ति के साथ सूफी विचारों और प्रेम की भाषा का भी सुंदर मेल मिलता है। इसी कारण उनकी कविता में ‘इश्क’, ‘साईं’, ‘हरि’, ‘राम’ और ‘खुदा’ जैसे शब्द एक ही आध्यात्मिक अनुभव के अलग संकेतों की तरह सामने आते हैं।
मध्व मुनीश्वर के पदों का बड़ा हिस्सा लोकधर्मी भाषा में है। वे कभी नाम-स्मरण और भक्ति की ओर प्रेरित करते हैं, तो कभी माया, लोभ, जात-पाँत और सांसारिक मोह पर चोट करते हैं। उनके शिष्य अमृतराय भी उल्लेखनीय भक्त कवि हुए।
मध्व मुनीश्वर के सबद और भक्ति पद
- बंदे मतकर इतना मान
- माशूक तेरा मुखड़ा दिखाव
- माया का ग़ुलाम
- रुखा पीपल पात है
- बंदे भज ग़रीबनवाज़
- बड़ा नाथ माधो अगडधत गुंडा
- बड़ा बाज़ीगर, साईं बडा बाज़ीगर
- यारो समजो रे दो दिन की जिनगी यारो
- बह्मन पढ़ा है वेद कू
- अंधा रे जग अंधा
- राखे असल जो ईमान
- अब कर दिल दीवाने पाक
- बंगला ज़ोर बनाया वे
- अब मत सोव दिवाने जाग