शिवमंगल सिंह 'सुमन' उत्तर-छायावाद युग के उन कवियों में हैं जिन्होंने छायावाद की भावुकता को ज़मीन की ठोस ज़ुबान दी। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले में हुआ, और शिक्षा-दीक्षा के बाद वे अध्यापन से जुड़े। उनकी कविता में जहाँ एक ओर मिट्टी, गाँव, किसान और मेहनत करने वाले लोग हैं, वहीं दूसरी ओर जीवन के प्रति एक साफ़ सकारात्मक दृष्टि भी है — निराशा नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का हौसला। 'मिट्टी की बारात' उनका सबसे प्रसिद्ध काव्य-संग्रह है, जिसमें भारतीय किसान और मेहनतकश समाज की तस्वीर है। 'विंध्य हिमालय' में उन्होंने भारत के भूगोल और संस्कृति को कविता में उतारा। उनकी कविताएँ लंबे समय तक स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में पढ़ी जाती रही हैं — 'हम पंछी उन्मुक्त गगन के' तो आज भी बच्चे पढ़ते हैं, और 'तूफ़ानों से घिरा हुआ' जैसी कविताएँ संघर्ष के दिनों में हौसला देती रही हैं। उनकी भाषा सरल है, पर बात गहरी — इसीलिए सामान्य पाठक से लेकर साहित्य के विद्यार्थी तक, दोनों उन्हें पढ़ते हैं।
इस पन्ने की रचनाएँ
- पथ भूल न जाना पथिक कहीं!
- मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझानेवाला
- फिर व्यर्थ मिला ही क्यों जीवन
- हम पंछी उन्मुक्त गगन के
- आज देश की मिट्टी बोल उठी है
- जेल में आती तुम्हारी याद
- विद्रोह करो, विद्रोह करो
- तब समझूँगा आया वसंत
- कटे अँगूठों की बंदनवारें
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