रामचरित उपाध्याय द्विवेदी युग के दोहाकार थे, और दोहा उस समय की सबसे सीधी और सबसे लोकप्रिय काव्य-विधा थी। दोहे की खूबी यह है कि उसमें दो ही पंक्तियों में पूरी बात कहनी पड़ती है — इसलिए हर शब्द तौलकर रखना होता है। उनकी 'दोहावली' में भक्ति, नीति और जीवन-दर्शन के दोहे संग्रहीत हैं। इन दोहों में वही परंपरा दिखती है जो कबीर और रहीम से चली आ रही थी — सीधी बात, कोई उलझाव नहीं, और सुनने वाले के मन में बैठ जाने वाली लय। द्विवेदी युग में खड़ी बोली का दबदबा बढ़ रहा था, पर दोहा अब भी लोगों की जुबान पर था, और रामचरित उपाध्याय जैसे कवियों ने उसे ज़िंदा रखा। उनके दोहों में नैतिक शिक्षा है, पर उपदेश का भारीपन नहीं — बात सरल है और सीधे काम की है। आज भी जब लोग नीति और जीवन के दोहे पढ़ना चाहते हैं, तो कबीर और रहीम के साथ इस तरह के कवियों को पढ़ते हैं। यहाँ उनकी दोहावली के सभी भाग एक जगह दिए गए हैं।
इस पन्ने की रचनाएँ
- दोहा / भाग 1
- दोहा / भाग 2
- दोहा / भाग 3
- दोहा / भाग 4
- दोहा / भाग 5
- दोहा / भाग 6
- दोहा / भाग 7
- दोहा / भाग 8
- दोहा / भाग 9
- दोहा / भाग 10