नून मीम राशिद (1910–1975), जिनका असली नाम नज़र मुहम्मद राशिद था, आधुनिक उर्दू कविता के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनका जन्म पंजाब के अलीपुर चट्ठा में हुआ और उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से अर्थशास्त्र में एम.ए. किया। उनकी पहली कविता ‘जुरअत-ए-परवाज़’ 1932 में प्रकाशित हुई और 1940 में उनका पहला कविता-संग्रह ‘मावरा’ सामने आया।
राशिद ने उर्दू कविता में आज़ाद नज़्म को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद के वर्षों में वे ऑल इंडिया रेडियो, वॉइस ऑफ अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र से भी जुड़े रहे। ‘ईरान में अजनबी’, ‘ला-मसावी इंसान’ और ‘गुमान का मुमकिन’ उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं। 1973 में वे इंग्लैंड चले गए और 1975 में लंदन में उनका निधन हुआ।
नून मीम राशिद की चुनिंदा नज़्म और ग़ज़लें (Selected Ghazals & Nazm of Noon Meem Rashid)
- हसरत-ए-इंतिज़ार-ए-यार न पूछ
- जो बे-सबात हो उस सरख़ुशी को क्या कीजे
- Jo be-sabaat ho us sarKHushi ko kya kije
- तिरे करम से ख़ुदाई में यूँ तो क्या न मिला
- Tere karam se KHudai mein yun to kya na mila
- तू आश्ना-ए-जज़्बा-ए-उल्फ़त नहीं रहा
- Tu aashna-e-jazba-e-ulfat nahin raha
- ज़िंदगी से डरते हो
- Zindagi se Darte ho
- हसन कूज़ा-गर (1)
- Hasan kuza-gar (1)
- अंधा कबाड़ी
- Andha kabaadi
- रक़्स
- Raqs
- मैं उसे वाक़िफ़-ए-उल्फ़त न करूँ
- Main use waqif-e-ulfat na karun
- हसन कूज़ा-गर (2)
- Hasan kuza-gar (2)
- हसन कूज़ा-गर (3)
- Hasan kuza-gar (3)
- हसन कूज़ा-गर (4)
- Hasan kuza-gar (4)
- मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
- Mere bhi hain kuchh KHwab
- सबा वीराँ
- Saba viran
- तआरुफ़
- Taaruf
- इंतिक़ाम
- Intiqam
- कौन सी उलझन को सुलझाते हैं हम?
- Kaun si uljhan ko suljhate hain ham?
- ख़ुद-कुशी
- KHud-kushi
- गुमाँ का मुमकिन- जो तू है मैं हूँ
- Guman ka mumkin- jo tu hai main hun
- बे-कराँ रात के सन्नाटे में
- Be-karan raat ke sannaTe mein
- इज़हार और रसाई
- Izhaar aur rasai
- चला आ रहा हूँ समुंदरों के विसाल से
- Chala aa raha hun samundaron ke visal se
- ज़माना ख़ुदा है
- Zamana KHuda hai
- दूरी
- Duri
- इस्राफ़ील की मौत
- Israfil ki maut
- गुनाह और मोहब्बत
- Gunah aur mohabbat
- तसव्वुफ़
- Tasawwuf
- अजनबी औरत
- Ajnabi aurat
- साल-गिरह की रात
- Sal-girah ki raat
- दरीचे के क़रीब
- Dariche ke qarib
- इत्तिफ़ाक़ात
- Ittifaqat
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ नून मीम राशिद की ग़ज़लें हैं — ‘हसरत-ए-इंतिज़ार-ए-यार न पूछ’, ‘जो बे-सबात हो उस सरख़ुशी को क्या कीजे’, ‘Jo be-sabaat ho us sarKHushi ko kya kije’, ‘तिरे करम से ख़ुदाई में यूँ तो क्या न मिला’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।