निदा फ़ाज़ली (1938–2016) हिंदी और उर्दू के प्रसिद्ध शायर, कवि एवं गीतकार थे। उनका वास्तविक नाम मुक़तदा हसन फ़ाज़ली था और उनकी शायरी की विशेषता सहज बोलचाल की भाषा, मानवीय संवेदना और आम जीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति थी।उनकी प्रमुख कृतियों में ‘लफ़्ज़ों का पुल’, ‘मोर नाच’, ‘आँख और ख़्वाब के दरमियाँ’ और ‘खोया हुआ सा कुछ’ शामिल हैं। ‘कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता’ उनकी सबसे लोकप्रिय ग़ज़लों में से एक है और वे फ़िल्मी गीतों के लिए भी प्रसिद्ध रहे।उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1998) और पद्मश्री (2013) से सम्मानित किया गया। हिंदी-उर्दू कविता को आम बोलचाल की सहज भाषा और आधुनिक जीवन के अनुभवों से जोड़ना उनकी प्रमुख साहित्यिक विशेषता थी।
- वालिद की वफ़ात पर
- दीवानगी रहे बाक़ी
- वक़्त से पहले
- आदमी की तलाश
- इत्तिफ़ाक़
- इंतिज़ार
- वो लड़की
- मोहब्बत
- सुना है मैं ने
- सोने से पहले
- लफ़्ज़ों का पुल
- फ़ासला
- सच्चाई
- बस यूँही जीते रहो
- नज़्म बहुत आसान थी पहले
- नींद पूरे बिस्तर में नहीं होती
- क़ौमी यक-जेहती
- एक कहानी
- ख़ुदा ख़ामोश है
- खेलता बच्चा
- ख़ुदा का घर नहीं कोई
- फ़क़त चंद लम्हे
- बूढ़ा
- फ़ातिहा
- सलीक़ा
- छोटी सी हँसी
- एक तस्वीर
- छोटी सी शॉपिंग
- कल रात
- नया दिन
- रुख़्सत होते वक़्त
- पैदाइश
- एक चिड़िया
- इतनी पी जाओ
- बे-ख़्वाब नींद
- हिजरत
- खेल
- मोर नाच
- नक़ाबें
- कच्ची दीवारें
- नया सफ़र
- सरहद-पार का एक ख़त पढ़ कर
- चौथा आदमी
- मशीन
- पिघलता धुआँ
- सितंबर1965
- जेब कटने के ब'अद
- बुझ गए नील-गगन