साहिर लुधियानवी (1921–1980) उर्दू के प्रसिद्ध शायर, कवि और गीतकार थे। उनका वास्तविक नाम अब्दुल हयी था और वे प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख रचनाकारों में गिने जाते हैं। उनकी शायरी में प्रेम, सामाजिक विषमता, शोषण और मानवीय संवेदना के स्वर प्रमुख हैं।
उनकी प्रमुख कृतियों में ‘तल्ख़ियाँ’, ‘आओ कि कोई ख़्वाब बुनें’ और ‘गाता जाए बंजारा’ शामिल हैं। फ़िल्मी गीतों में ‘जिन्हें नाज़ है हिंद पर’, ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए’ और ‘मैं पल दो पल का शायर हूँ’ विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।
उनकी विशिष्टता प्रेम और रोमांस को सामाजिक चेतना तथा विद्रोही तेवर के साथ जोड़ने में है। उन्हें पद्मश्री (1971) और दो फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिले; ताजमहल (1963) और कभी-कभी (1976) के गीतों के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
- कभी कभी
- ख़ूब-सूरत मोड़
- ताज-महल
- ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया
- मैं पल दो पल का शा'इर हूँ
- मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़
- परछाइयाँ
- ऐ शरीफ़ इंसानो
- औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
- वो सुब्ह कभी तो आएगी
- ख़ून फिर ख़ून है
- फ़रार
- तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
- चकले
- लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
- मता-ए-ग़ैर
- 26 जनवरी
- किसी को उदास देख कर
- हिरास
- मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
- जश्न-ए-ग़ालिब
- नूर-जहाँ के मज़ार पर
- बच्चे मन के सच्चे
- तेरी आवाज़
- आओ कि कोई ख़्वाब बुनें
- इंतिज़ार
- मादाम
- उमीद
- 'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो
- मिरे अहद के हसीनो
- विर्सा
- शिकस्त
- आवाज़-ए-आदम
- यकसूई
- धरती की सुलगती छाती से बेचैन शरारे पूछते हैं
- एक मुलाक़ात
- आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं है
- ख़ुदा-ए-बर्तर तिरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यूँ है
- फ़नकार
- मुझे सोचने दे
- जवाहर-लाल नेहरू
- एक तस्वीर-ए-रंग
- दिल अभी
- रद्द-ए-अमल
- मिरे गीत
- अहल-ए-दिल और भी हैं
- बहुत घुटन है
- मायूस तो हूँ वा'दे से तिरे
- कोई दिल की चाहत से मजबूर है
- अपने अंदर ज़रा झाँक मेरे वतन