शहरयार (1936–2012) आधुनिक उर्दू के प्रमुख शायर और गीतकार थे। उनका वास्तविक नाम अख़लाक़ मोहम्मद ख़ान था और वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे।
उनकी प्रमुख कृतियों में ‘इस्म-ए-आज़म’, ‘ख़्वाब का दर बंद है’, ‘शाम होने वाली है’ और ‘मिलता रहूँगा ख़्वाब में’ शामिल हैं। फ़िल्म ‘उमराव जान’ की ग़ज़लों—‘दिल चीज़ क्या है’, ‘इन आँखों की मस्ती’—से उन्हें व्यापक लोकप्रियता मिली।
उनकी शायरी की विशेषता आधुनिक जीवन की संवेदनाओं, प्रेम और मानवीय अनुभूतियों को सरल एवं प्रभावशाली भाषा में व्यक्त करना है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1987) और ज्ञानपीठ पुरस्कार (2008) से सम्मानित किया गया।
- ख़्वाब का दर बंद है
- एक और साल गिरह
- ज़वाल की हद
- तन्हाई
- चुपके से इधर आ जाओ
- रात जुदाई की रात
- वो कौन था
- अहद-ए-हाज़िर की दिल-रुबा मख़्लूक़
- ज़िंदा रहने का ये एहसास
- तम्बीह
- अपनी याद में
- एक लम्हे से दूसरे लम्हे तक
- वो मोड़
- मौत
- अब के बरस
- नया खेल
- नया अमृत
- फ़रार
- खेल का नतीजा
- आरज़ू
- फ़ैसले की घड़ी
- वापसी
- ख़्वाब
- नए अहद का नया सवाल
- ख़लीलुर्रहमान आज़मी की याद में
- एक काली नज़्म
- 'नजमा' के लिए एक नज़्म
- साए
- नया उफ़क़
- एक सियासी नज़्म
- एतराफ़
- आख़िरी साँस
- अजीब काम
- एक नज़्म
- सैगंधी
- जिस्म की कश्ती में आ
- नफ़ी से इसबात तक
- कच्चे रस्तों से
- रतजगों का ज़वाल
- मुनज़्ज़म मनाज़िर से आगे
- एक मंज़र
- ला-ज़वाल होने का
- एक ख़ुश-ख़बरी
- चलो तुम को....
- फिर सफ़र बे-सम्त बे-मंज़िल हुआ
- ला-ज़वाल सुकूत
- उम्मीद ओ बीम
- गुम-शुदा
- मुझ को मिलना है 'वहीद-अख़्तर' से