फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (1911–1984) उर्दू के प्रसिद्ध शायर, लेखक और पत्रकार व रचनाकार थे। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘नक़्श-ए-फ़रियादी’, ‘दस्त-ए-सबा’, ‘ज़िंदाँनामा’, ‘दस्त-ए-तह-ए-संग’ और ‘शाम-ए-शहर-ए-याराँ’ शामिल हैं। ‘गुलों में रंग भरे’, ‘मुझसे पहली-सी मोहब्बत’ और ‘हम देखेंगे’ उनकी लोकप्रिय रचनाओं में हैं।
- मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
- रक़ीब से!
- कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
- व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
- सुब्ह-ए-आज़ादी (अगस्त-47)
- तन्हाई
- बोल
- निसार मैं तेरी गलियों के
- आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
- याद
- हम जो तारीक राहों में मारे गए
- ये फ़स्ल उमीदों की हमदम
- चंद रोज़ और मिरी जान
- इस वक़्त तो यूँ लगता है
- कुत्ते
- दो इश्क़
- मिरे हमदम मिरे दोस्त!
- इंतिसाब
- दिल-ए-मन मुसाफ़िर-ए-मन
- ढाका से वापसी पर
- दुआ
- पास रहो
- लौह-ओ-क़लम
- हार्ट-अटैक
- हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं
- दर्द आएगा दबे पाँव
- बहार आई
- शीशों का मसीहा कोई नहीं
- मौज़ू-ए-सुख़न
- तराना
- कोई 'आशिक़ किसी महबूबा से!
- जब तेरी समुंदर आँखों में
- तुम अपनी करनी कर गुज़रो
- रंग है दिल का मिरे
- आख़िरी ख़त
- मुलाक़ात
- ख़ुदा वो वक़्त न लाए
- ज़िंदाँ की एक शाम
- तुम्हारे हुस्न के नाम
- हिज्र की राख और विसाल के फूल
- फलस्तीनी बच्चे के लिए लोरी
- जो मेरा तुम्हारा रिश्ता है
- आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल
- तुम ही कहो क्या करना है
- सोच
- मिरे दर्द को जो ज़बाँ मिले
- कोई आशिक़ किसी महबूबा से!
- एक रह-गुज़र पर
- कहाँ जाओगे
- आज की रात
- इंतिज़ार