साहिर लुधियानवी (Sahir Ludhianvi) (1921–1980) आधुनिक उर्दू शायरी और हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली शायर, प्रगतिशील कवि और गीतकार थे। उनका वास्तविक नाम अब्दुल हई था और उनका जन्म 8 मार्च 1921 को लुधियाना (पंजाब) में हुआ। कॉलेज के दिनों में ही उनकी कालजयी नज़्मों और ग़ज़लों ने अदबी दुनिया का ध्यान खींचा। 1943 में वे लाहौर गए, जहाँ उनका ऐतिहासिक कविता संग्रह ‘तल्ख़ियाँ’ प्रकाशित हुआ और वे ‘अदब-ए-लतीफ़’, ‘शाहकार’ व ‘सवेरा’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के संपादन से जुड़े। इसी दौरान वे प्रगतिशील लेखक आंदोलन (Progressive Writers' Movement) के प्रमुख स्तंभ बने।
1949 में मुंबई आकर उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपने गीतों से नया इतिहास रचा। ‘नौजवान’ और ‘बाज़ी’ से शुरू होकर ‘प्यासा’, ‘ताजमहल’, ‘कभी कभी’ और ‘त्रिशूल’ जैसी फ़िल्मों के लिए उन्होंने अविस्मरणीय गीत लिखे। ‘ताजमहल’ और ‘कभी कभी’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला तथा 1971 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘तल्ख़ियाँ’ और ‘आओ कि कोई ख़्वाब बुनें’ शामिल हैं। नीचे साहिर लुधियानवी की लोकप्रिय ग़ज़लों, नज़्मों और गीतों की संपूर्ण अनुक्रमणिका (TOC) दी गई है।
साहिर लुधियानवी की लोकप्रिय ग़ज़लें एवं नज़्में (Sahir Ludhianvi Poetry & Ghazal Collection)
- कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
- ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा
- मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
- तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम
- चेहरे पे ख़ुशी छा जाती है आँखों में सुरूर आ जाता है
- हर तरह के जज़्बात का एलान हैं आँखें
- तुम अपना रंज-ओ-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो
- दूर रह कर न करो बात क़रीब आ जाओ
- अपना दिल पेश करूँ अपनी वफ़ा पेश करूँ
- देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से
- मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी कभी
- मोहब्बत तर्क की मैं ने गरेबाँ सी लिया मैं ने
- बरबाद-ए-मोहब्बत की दुआ साथ लिए जा
- तिरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है कि मर जाएँ
- भूले से मोहब्बत कर बैठा, नादाँ था बेचारा, दिल ही तो है
- देखा है ज़िंदगी को कुछ इतना क़रीब से
- भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मागर से हम
- अहल-ए-दिल और भी हैं अहल-ए-वफ़ा और भी हैं
- हवस-नसीब नज़र को कहीं क़रार नहीं
- इतनी हसीन इतनी जवाँ रात क्या करें
- संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है
- बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों मोहब्बतों के दिए जला के
- जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं
- न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए
- सदियों से इंसान ये सुनता आया है
- संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे
- पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने
- सज़ा का हाल सुनाएँ जज़ा की बात करें
- अब आएँ या न आएँ इधर पूछते चलो
- ये वादियाँ ये फ़ज़ाएँ बुला रही हैं तुम्हें
- शर्मा के यूँ न देख अदा के मक़ाम से
- पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है
- बहुत घुटन है कोई सूरत-ए-बयाँ निकले
- मैं ज़िंदा हूँ ये मुश्तहर कीजिए
- अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन आज़ाद है
- लब पे पाबंदी तो है एहसास पर पहरा तो है
- देखा तो था यूँही किसी ग़फ़लत-शिआर ने
- इस तरफ़ से गुज़रे थे क़ाफ़िले बहारों के
- मिरे दिल में आज क्या है तू कहे तो मैं बता दूँ
- जब कभी उन की तवज्जोह में कमी पाई गई
- ये ज़मीं किस क़दर सजाई गई
- तोड़ लेंगे हर इक शय से रिश्ता तोड़ देने की नौबत तो आए
- मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी-कभी
- गुलशन गुलशन फूल
- ख़ुद्दारियों के ख़ून को अर्ज़ां न कर सके
- क्या जानें तिरी उम्मत किस हाल को पहुँचेगी
- हम आप की आँखों में इस दिल को बसा दें तो
- तरब-ज़ारों पे क्या बीती सनम-ख़ानों पे क्या गुज़री
- छू लेने दो नाज़ुक होंटों को कुछ और नहीं है जाम है ये
- अक़ाएद वहम हैं मज़हब ख़याल-ए-ख़ाम है साक़ी
- तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले
- फ़न जो नादार तक नहीं पहुँचा
- जीवन के सफ़र में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को
- पाँव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी
- हर क़दम मरहला-दार-ओ-सलीब आज भी है
- पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने
- वक़्त से दिन और रात वक़्त से कल और आज
- हर-चंद मिरी क़ुव्वत-ए-गुफ़्तार है महबूस
- निगाह-ए-नाज़ के मारों का हाल क्या होगा
- युंही दिल ने चाहा था रोना-रुलाना
- सिमटी हुई ये घड़ियाँ फिर से न बिखर जाएँ
- मुझे ये फूल न दे तुझ को दिलबरी की क़सम
- इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ
- नफ़स के लोच में रम ही नहीं कुछ और भी है
- जो लुत्फ़-ए-मय-कशी है निगारों में आएगा
- गो मसलक-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी है कोई चीज़
- kabhi KHud pe kabhi haalat pe rona aaya
- ye zulf agar khul ke bikhar jae to achchha
- main zindagi ka sath nibhata chala gaya
- tang aa chuke hain kashmakash-e-zindagi se hum
- chehre pe KHushi chha jati hai aankhon mein surur aa jata hai
- har tarah ke jazbaat ka elan hain aankhen
- tum apna ranj-o-gham apni pareshani mujhe de do
- dur rah kar na karo baat qarib aa jao
- apna dil pesh karun apni wafa pesh karun
- dekha hai zindagi ko kuchh itne qarib se
- milti hai zindagi mein mohabbat kabhi kabhi
- mohabbat tark ki maine gareban si liya maine
- barbaad-e-mohabbat ki dua sath liye ja
- teri duniya mein jine se to behtar hai ki mar jaen
- bhule se mohabbat kar baiTha, nadan tha bechaara, dil hi to hai
- dekha hai zindagi ko kuchh itna qarib se
- bhaDka rahe hain aag lab-e-naghmagar se hum
- ahl-e-dil aur bhi hain ahl-e-wafa aur bhi hain
- hawas-nasib nazar ko kahin qarar nahin
- itni hasin itni jawan raat kya karen
- sansar ki har shai ka itna hi fasana hai
- bujha diye hain KHud apne hathon mohabbaton ke diye jala ke
- jurm-e-ulfat pe hamein log saza dete hain
- na tu zamin ke liye hai na aasman ke liye
- sadiyon se insan ye sunta aaya hai
- sansar se bhage phirte ho bhagwan ko tum kya paoge
- ponchh kar ashk apni aankhon se muskurao to koi बात bane
- saza ka haal sunaen jaza ki baat karen
- ab aaen ya na aaen idhar puchhte chalo
- ye wadiyan ye fazaen bula rahi hain tumhein
- sharma ke yun na dekh ada ke maqam se
- parbaton ke peDon par sham ka basera hai
- bahut ghuTan hai koi surat-e-bayan nikle
- main zinda hun ye mushtahar kijiye
- ab koi gulshan na ujDe ab watan aazad hai
- lab pe pabandi to hai ehsas par pahra to hai
- dekha to tha yunhi kisi ghaflat-shiar ne
- is taraf se guzre the qafile bahaaron ke
- mere dil mein aaj kya hai tu kahe to main bata dun
- jab kabhi unki tawajjoh mein kami pai gai
- ye zamin kis qadar sajai gai
- toD lenge har ek shai se rishta toD dene ki naubat to aae
- milti hai zindagi mein mohabbat kabhi-kabhi
- gulshan gulshan phul
- KHuddariyon ke KHun ko arzan na kar sake
- kya jaanen teri ummat kis haal ko pahunchegi
- hum aap ki aankhon mein is dil ko basa den to
- tarab-zaron pe kya biti sanam-KHanon pe kya guzri
- chhu lene do nazuk honTon ko kuchh aur nahin hai jam hai ye
- aqaed wahm hain mazhab KHayal-e-KHam hai saqi
- tadbir se bigDi hui taqdir bana le
- fan jo nadar tak nahin pahuncha
- jiwan ke safar mein rahi milte hain bichhaD jaane ko
- panw chhu lene do phulon ko inayat hogi
- har qadam marhala-e-dar-o-salib aaj bhi hai
- ponchh kar ashk apni aankhon se muskurao to koi baat bane
- waqt se din aur raat waqt se kal aur aaj
- har-chand meri quwwat-e-guftar hai mahbus
- nigah-e-naz ke maron ka haal kya hoga
- yunhi dil ne chaha tha rona-rulana
- simTi hui ye ghaDiyan phir se na bikhar jaen
- mujhe ye phul na de tujhko dilbari ki qasam
- ishq ki garmi-e-jazbaat kise pesh karun
- nafas ke loch mein ram hi nahin kuchh aur bhi hai
- jo lutf-e-mai-kashi hai nigaron mein aaega
- go maslak-e-taslim-o-raza bhi hai koi chiz
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
साहिर लुधियानवी कौन थे?
साहिर लुधियानवी (1921–1980) लुधियाना से थे और फ़िल्मी गीतकार के रूप में भी उतने ही बड़े थे जितने शायर के रूप में। “मैं पल दो पल का शायर हूँ” उनकी अपनी ही शायरी की सबसे सच्ची पहचान है।
साहिर लुधियानवी की सबसे मशहूर ग़ज़ल कौन सी है?
“साहिर लुधियानवी की लोकप्रिय ग़ज़लें एवं नज़्में (Sahir Ludhianvi Poetry & Ghazal Collection)” उनकी सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली ग़ज़ल है, जो इस पन्ने पर पूरी दी गई है।
साहिर लुधियानवी की और ग़ज़लें कहाँ पढ़ें?
ग़ज़ल शायरी संग्रह में 80 शायरों की ग़ज़लें एक जगह हैं।
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ साहिर लुधियानवी की ग़ज़लें हैं — ‘कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया’, ‘ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा’, ‘मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया’, ‘तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।