परिचय
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू के सबसे मक़बूल शायरों में हैं, जिनकी शायरी में इश्क़ और इंक़लाब दोनों एक साथ चलते हैं।
सियालकोट (पंजाब) में जन्मे फ़ैज़ तरक़्क़ी-पसंद तहरीक के अहम नाम थे, और ‘हम देखेंगे’ जैसी उनकी नज़्में आज भी ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बनती हैं।
1951 के रावलपिंडी षड्यंत्र केस में उन्हें जेल जाना पड़ा, और उनके संग्रह ‘दस्त-ए-सबा’ और ‘ज़िंदान-नामा’ वहीं की देन हैं।
1962 में वे लेनिन पीस प्राइज़ पाने वाले पहले एशियाई शायर बने; यहाँ पढ़िए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की चुनिंदा ग़ज़लें।
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के
वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के
इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के
भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज ‘फ़ैज़’ मत पूछ वलवले दिल-ए-ना-कर्दा-कार के
donon jahan teri mohabbat mein haar ke
donon jahan teri mohabbat mein haar ke wo ja raha hai koi shab-e-gham guzar ke
viran hai mai-kada KHum-o-saghar udas hain tum kya gae ki ruTh gae din bahaar ke
ek fursat-e-gunah mili wo bhi chaar din dekhe hain hum ne hausle parwardigar ke
duniya ne teri yaad se begana kar diya tujh se bhi dil-fareb hain gham rozgar ke
bhule se muskura to diye the wo aaj ‘faiz’ mat puchh walwale dil-e-na-karda-kar ke
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़लें
- दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
- गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
- आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
- हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है
- ”आप की याद आती रही रात भर”
- नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही
- तुम आए हो न शब-ए-इंतिज़ार गुज़री है
- कब याद में तेरा साथ नहीं कब हात में तेरा हात नहीं
- न गँवाओ नावक-ए-नीम-कश दिल-ए-रेज़ा-रेज़ा गँवा दिया
- शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई
- तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए
- राज़-ए-उल्फ़त छुपा के देख लिया
- कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी
- दिल में अब यूँ तिरे भूले हुए ग़म आते हैं
- तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
- नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं
- बात बस से निकल चली है
- कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे
- हम ने सब शेर में सँवारे थे
- तिरी उमीद तिरा इंतिज़ार जब से है
- रंग पैराहन का ख़ुशबू ज़ुल्फ़ लहराने का नाम
- आज यूँ मौज-दर-मौज ग़म थम गया इस तरह ग़म-ज़दों को क़रार आ गया
- वो बुतों ने डाले हैं वसवसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया
- हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए
- वफ़ा-ए-वादा नहीं वादा-ए-दिगर भी नहीं
Faiz Ahmad Faiz Ghazal in English Or Roman
- donon jahan teri mohabbat mein haar ke
- gulon mein rang bhare baad-e-nau-bahaar chale
- aae kuchh abr kuchh sharab aae
- hum par tumhaari chah ka ilzam hi to hai
- aap ki yaad aati rahi raat bhar
- nahin nigah mein manzil to justuju hi sahi
- tum aae ho na shab-e-intizar guzri hai
- kab yaad mein tera sath nahin kab hat mein tera hat nahin
- na ganwao nawak-e-nim-kash dil-e-reza-reza ganwa diya
- sham-e-firaq ab na puchh aai aur aa ke Tal gai
- tere gham ko jaan ki talash thi tere jaan-nisar chale gae
- raaz-e-ulfat chhupa ke dekh liya
- kab Thahrega dard ai dil kab raat basar hogi
- dil mein ab yun tere bhule hue gham aate hain
- tumhaari yaad ke jab zaKHm bharne lagte hain
- nasib aazmane ke din aa rahe hain
- baat bas se nikal chali hai
- kab tak dil ki KHair manaen kab tak rah dikhlaoge
- humne sab sher mein sanware the
- teri umid tera intizar jab se hai
- rang pairahan ka KHushbu zulf lahrane ka nam
- aaj yun mauj-dar-mauj gham tham gaya is tarah gham-zadon ko qarar aa gaya
- wo buton ne Dale hain waswase ki dilon se KHauf-e-KHuda gaya
- har haqiqat majaz ho jae
- wafa-e-wada nahin wada-e-digar bhi nahin
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की सबसे मशहूर ग़ज़ल कौन सी है?
“दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के” उनकी सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली ग़ज़ल है, जो इस पन्ने पर पूरी दी गई है।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़लें किस भाषा में पढ़ी जा सकती हैं?
इस पन्ने पर ग़ज़लें देवनागरी में हैं, और कुछ ग़ज़लें रोमन में भी दी गई हैं ताकि गुनगुनाना आसान हो।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की और ग़ज़लें कहाँ मिलेंगी?
ग़ज़ल शायरी संग्रह में 80 शायरों की ग़ज़लें एक जगह हैं, वहाँ से आप आगे पढ़ सकते हैं।
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़लें हैं — ‘दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के’, ‘गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले’, ‘आए कुछ अब्र कुछ शराब आए’, ‘हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।