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दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें: Dushyant Kumar Ghazal in Hindi

2024-11-21 · ग़ज़ल / Ghazal / हिंदी कविता / Hindi Poetry

 दुष्यंत कुमार (1933–1975) हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, शायर और लेखक थे। वे आधुनिक हिंदी ग़ज़ल के प्रणेता माने जाते हैं और अपनी रचनाओं में सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय मुद्दों को बड़े प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। उनकी कविता में आम जनता की आवाज़ सुनाई देती है, जो अपने समय की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों का सटीक वर्णन करती है।

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ / दुष्यंत कुमार

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ
हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ

दुष्यंत कुमार की रचनाएँ Dushyant Kumar Rachnaen

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दुष्यंत कुमार कौन थे?

दुष्यंत कुमार (1931–1975) ने हिंदी ग़ज़ल को आम आदमी की ज़बान दी। “हो गई है पीर पर्वत-सी” उनकी सबसे मशहूर ग़ज़ल है, जो आज भी सुनाई और पढ़ी जाती है।

दुष्यंत कुमार की सबसे मशहूर ग़ज़ल कौन सी है?

“मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ / दुष्यंत कुमार” उनकी सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली ग़ज़ल है, जो इस पन्ने पर पूरी दी गई है।

दुष्यंत कुमार की और ग़ज़लें कहाँ पढ़ें?

ग़ज़ल शायरी संग्रह में 80 शायरों की ग़ज़लें एक जगह हैं।

इस पन्ने की ग़ज़लें

यहाँ दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें हैं — ‘सूर्य का स्वागत’, ‘आवाज़ों के घेरे’, ‘जलते हुए वन का वसन्त’, ‘एक कंठ विषपायी’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।

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