अहमद फ़राज़ उर्दू के प्रसिद्ध पाकिस्तानी शायर थे। उनका असली नाम सैयद अहमद शाह था। उनका जन्म 12 जनवरी 1931 को कोहाट, ब्रिटिश भारत में हुआ था। उन्होंने पेशावर विश्वविद्यालय से उर्दू और फ़ारसी की शिक्षा प्राप्त की। उनकी शायरी में प्रेम, विरह और सामाजिक संवेदनाओं का सुंदर मेल दिखाई देता है। वे अपनी ग़ज़लों और नज़्मों के लिए विशेष रूप से लोकप्रिय हुए। उनके प्रमुख संग्रहों में तन्हा तन्हा, दर्द-ए-आशोब और शब-ए-ख़ून शामिल हैं। उन्हें साहित्यिक सेवाओं के लिए कई सम्मान मिले। अहमद फ़राज़ का निधन 25 अगस्त 2008 को इस्लामाबाद में हुआ।
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं
सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की
सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं
सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़
सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं
सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं
सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की
सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं
सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है
सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं
सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं
सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की
जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं
सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं
सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं
सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है
कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं
वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं
बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं
सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं
रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं
चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं
किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे
कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं
कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं
अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ
'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
अहमद फ़राज़ की ग़ज़लें | Ahmad Faraz Ghazal
- सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
- रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
- अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
- इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ
- ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
- सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
- अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ
- आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
- दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
- सामने उस के कभी उस की सताइश नहीं की
- क़ुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता
- अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
- दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें
- हर कोई दिल की हथेली पे है सहरा रक्खे
- ये क्या कि सब से बयाँ दिल की हालतें करनी
- जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो
- न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतिज़ार कोई तो हो
- उस ने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया
- उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
- आशिक़ी में 'मीर' जैसे ख़्वाब मत देखा करो
- क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगे
- गुफ़्तुगू अच्छी लगी ज़ौक़-ए-नज़र अच्छा लगा
- फिर उसी रहगुज़ार पर शायद
- अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
- करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे
- मैं तो मक़्तल में भी क़िस्मत का सिकंदर निकला
- रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं
- कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो
- तुझे है मश्क़-ए-सितम का मलाल वैसे ही
- तेरी बातें ही सुनाने आए
- मिसाल-ए-दस्त-ए-ज़ुलेख़ा तपाक चाहता है
- ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते
- शो'ला था जल-बुझा हूँ हवाएँ मुझे न दो
- तुझ से बिछड़ के हम भी मुक़द्दर के हो गए
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
अहमद फ़राज़ का असली नाम क्या था?
अहमद फ़राज़ का असली नाम सैयद अहमद शाह था। वे उर्दू के प्रसिद्ध पाकिस्तानी शायर थे।
अहमद फ़राज़ का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उनका जन्म 12 जनवरी 1931 को कोहाट (ब्रिटिश भारत) में हुआ था।
अहमद फ़राज़ के प्रमुख संग्रह कौन-से हैं?
‘तन्हा तन्हा’, ‘दर्द-ए-आशोब’ और ‘शब-ए-ख़ून’ उनके प्रमुख संग्रह हैं।
अहमद फ़राज़ का निधन कब हुआ?
उनका निधन 25 अगस्त 2008 को इस्लामाबाद में हुआ।
अहमद फ़राज़ की प्रसिद्ध ग़ज़लें कौन-सी हैं?
‘रंजिश ही सही’, ‘कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो’ और ‘आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा’ उनकी प्रसिद्ध ग़ज़लों में शामिल हैं।
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ अहमद फ़राज़ की ग़ज़लें हैं — ‘सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं’, ‘रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ’, ‘अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें’, ‘इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।