पीरज़ादा क़ासिम (Pirzada Qasim) (जन्म 8 फ़रवरी 1943) उर्दू साहित्य के प्रतिष्ठित शायर, प्रख्यात वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद् हैं। उनका पूरा नाम पीरज़ादा क़ासिम रज़ा सिद्दीक़ी है और उनका जन्म दिल्ली में हुआ था। विभाजन के उपरांत उनका परिवार पाकिस्तान चला गया, जहाँ उन्होंने कराची विश्वविद्यालय से स्नातक तथा न्यूकैसल यूनिवर्सिटी (इंग्लैंड) से न्यूरोकैमिस्ट्री में पीएच.डी. की। वे कराची विश्वविद्यालय और फ़ेडरल उर्दू यूनिवर्सिटी के कुलपति (Vice-Chancellor) सहित कई उच्च अकादमिक पदों पर कार्यरत रहे।
पीरज़ादा क़ासिम 1960 के दशक से उर्दू अदब में सक्रिय हैं। आधुनिक ग़ज़ल और नज़्म विधा में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘तूफ़ान के जश्न में’ और ‘शोलों पे ज़बान’ उनके बहुचर्चित काव्य-संग्रह हैं। उनकी शायरी में निजी अनुभवों के साथ-साथ समाज की कड़वी सच्चाइयों, दार्शनिक विचारों और संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है। यहाँ उनकी चुनिंदा लोकप्रिय ग़ज़लों का संग्रह प्रस्तुत है।
पीरज़ादा क़ासिम की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Pirzada Qasim Shayari Collection)
- ग़म से बहल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं
- बे-दिली से हँसने को ख़ुश-दिली न समझा जाए
- ज़ख़्म दबे तो फिर नया तीर चला दिया करो
- ख़ून से जब जला दिया एक दिया बुझा हुआ
- कौन गुमाँ यक़ीं बना कौन सा घाव भर गया
- मैं कब से अपनी तलाश में हूँ मिला नहीं हूँ
- अब हर्फ़-ए-तमन्ना को समाअत न मिलेगी
- हमारी तरह कोई दूसरा हुआ भी नहीं
- इक सज़ा और असीरों को सुना दी जाए
- सानेहा नहीं टलता सानेहे पे रोने से
- चराग़ हूँ कब से जल रहा हूँ मुझे दुआओं में याद रखिए
- दर्द है कि नग़्मा है फ़ैसला किया जाए
- एक से सिलसिले हैं सब हिज्र की रुत बता गई
- अदाकारी में भी सौ कर्ब के पहलू निकल आए
- चाँद भी बुझा डाला दिल दुखाने वालों ने
- ये हादिसा मुझे हैरान कर गया सर-ए-शाम
- ज़िंदगी ने झेले हैं सब 'अज़ाब दुनिया के
- कुदूरतों के दरमियाँ अदावतों के दरमियाँ
- लड़खड़ाते हुए भी और सँभलते हुए भी
- वो एक ख़्वाब जो देखा गया था उजलत में
- दिल अगर कुछ माँग लेने की इजाज़त माँगता
- आवाज़ में आवाज़ मिलाते ही रहे हम
- नज़र में नित-नई हैरानियाँ लिए फिरिए
- Gham se bahal rahe hain aap aap bahut ajib hain
- Be-dili se hansne ko KHush-dili na samjha jae
- ZaKHm dabe to phir naya tir chala diya karo
- KHun se jab jala diya ek diya bujha hua
- Kaun guman yaqin bana kaun sa ghaw bhar gaya
- Main kab se apni talash mein hun mila nahin hun
- Ab harf-e-tamanna ko samaat na milegi
- Hamari tarah koi dusra hua bhi nahin
- Ek saza aur asiron ko suna di jae
- Kabhi hawa to kabhi KHak-e-rahguzar hona
- Saneha nahin Talta sanehe pe rone se
- Charagh hun kab se jal raha hun mujhe duaon mein yaad rakhiye
- Dard hai ki naghma hai faisla kiya jae
- Ek se silsile hain sab hijr ki rut bata gai
- Adakari mein bhi sau karb ke pahlu nikal aae
- Chand bhi bujha Dala dil dukhane walon ne
- Ye hadisa mujhe hairan kar gaya sar-e-sham
- Zindagi ne jhele hain sab azab duniya ke
- Kuduraton ke darmiyan adawaton ke darmiyan
- LaDkhaDate hue bhi aur sambhalte hue bhi
- Wo ek KHwab jo dekha gaya tha ujlat mein
- Dil agar kuchh mang lene ki ijazat mangta
- Aawaz mein aawaz milate hi rahe hum
- Nazar mein nit-nai hairaniyan liye phiriye
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ पीरज़ादा क़ासीम की ग़ज़लें हैं — ‘ग़म से बहल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं’, ‘बे-दिली से हँसने को ख़ुश-दिली न समझा जाए’, ‘ज़ख़्म दबे तो फिर नया तीर चला दिया करो’, ‘ख़ून से जब जला दिया एक दिया बुझा हुआ’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।