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Pirzada Qasim Ghazal : पीरज़ादा क़ासीम की ग़ज़लें

2024-12-05 · ग़ज़ल / शायरी

पीरज़ादा क़ासिम (Pirzada Qasim) (जन्म 8 फ़रवरी 1943) उर्दू साहित्य के प्रतिष्ठित शायर, प्रख्यात वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद् हैं। उनका पूरा नाम पीरज़ादा क़ासिम रज़ा सिद्दीक़ी है और उनका जन्म दिल्ली में हुआ था। विभाजन के उपरांत उनका परिवार पाकिस्तान चला गया, जहाँ उन्होंने कराची विश्वविद्यालय से स्नातक तथा न्यूकैसल यूनिवर्सिटी (इंग्लैंड) से न्यूरोकैमिस्ट्री में पीएच.डी. की। वे कराची विश्वविद्यालय और फ़ेडरल उर्दू यूनिवर्सिटी के कुलपति (Vice-Chancellor) सहित कई उच्च अकादमिक पदों पर कार्यरत रहे।

पीरज़ादा क़ासिम 1960 के दशक से उर्दू अदब में सक्रिय हैं। आधुनिक ग़ज़ल और नज़्म विधा में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘तूफ़ान के जश्न में’ और ‘शोलों पे ज़बान’ उनके बहुचर्चित काव्य-संग्रह हैं। उनकी शायरी में निजी अनुभवों के साथ-साथ समाज की कड़वी सच्चाइयों, दार्शनिक विचारों और संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है। यहाँ उनकी चुनिंदा लोकप्रिय ग़ज़लों का संग्रह प्रस्तुत है।

पीरज़ादा क़ासिम की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Pirzada Qasim Shayari Collection)

इस पन्ने की ग़ज़लें

यहाँ पीरज़ादा क़ासीम की ग़ज़लें हैं — ‘ग़म से बहल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं’, ‘बे-दिली से हँसने को ख़ुश-दिली न समझा जाए’, ‘ज़ख़्म दबे तो फिर नया तीर चला दिया करो’, ‘ख़ून से जब जला दिया एक दिया बुझा हुआ’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।

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