मुज़्तर ख़ैराबादी (Muztar Khairabadi) (1865–1927) उर्दू के प्रसिद्ध क्लासिकल शायर थे। उनका असली नाम सय्यद मुहम्मद इफ़्तिख़ार हुसैन रिज़वी था और उनका जन्म उत्तर प्रदेश के ख़ैराबाद में हुआ था। वे प्रख्यात विद्वान और शायर फ़ज़्ल-ए-हक़ ख़ैराबादी के पौत्र थे। उनकी शुरुआती तालीम उनकी माँ की देखरेख में हुई, जो अरबी, फ़ारसी और उर्दू की विदुषी थीं। बाद में उन्होंने मशहूर उस्ताद शायर अमीर मीनाई से शायरी की बारीकियों का मार्गदर्शन लिया।
मुज़्तर ख़ैराबादी का शुमार उर्दू शास्त्रीय शायरी के प्रमुख उस्तादों में होता है। उनकी शायरी में दर्द, हुस्न-ओ-इश्क़, हिज्र (विरह) और गहरी मानवीय भावनाओं की बेजोड़ अक्कासी मिलती है। वे टोंक, ग्वालियर, रामपुर, भोपाल और इंदौर जैसी प्रमुख रियासतों से भी जुड़े रहे तथा टोंक और ग्वालियर में न्यायिक पद (मुंसिफ़/काज़ी) पर कार्य किया।
मुज़्तर ख़ैराबादी ने ग़ज़ल के साथ-साथ नात और अन्य काव्य रूपों में भी अद्वितीय रचनाएँ लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियों में नज़र-ए-ख़ुदा (1913), इल्हामात, नाला-ए-दर्द और सब्र-ओ-शकीब की लूट शामिल हैं। उनका नातिया कलाम मीलाद-ए-मुस्तफ़ा भी अदबी दुनिया में विशेष स्थान रखता है।
उर्दू अदब के मशहूर शायर और फ़िल्म गीतकार जाँ निसार अख़्तर उनके सुपुत्र थे और प्रसिद्ध गीतकार व पटकथा लेखक जावेद अख़्तर उनके पोते हैं। मुज़्तर ख़ैराबादी का इंतिक़ाल 1927 में ग्वालियर में हुआ। उनकी कालजयी शायरी और ग़ज़लें आज भी साहित्य प्रेमियों के दिलों में ज़िंदा हैं।
मुज़्तर ख़ैराबादी की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Muztar Khairabadi Best Ghazals)
- न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
- इलाज-ए-दर्द-ए-दिल तुम से मसीहा हो नहीं सकता
- अगर तुम दिल हमारा ले के पछताए तो रहने दो
- मेरे महबूब तुम हो यार तुम हो दिल-रुबा तुम हो
- तू मुझे किस के बनाने को मिटा बैठा है
- उन्हीं लोगों की बदौलत ये हसीं अच्छे हैं
- आप क्यूँ बैठे हैं ग़ुस्से में मिरी जान भरे
- वफ़ा क्या कर नहीं सकते हैं वो लेकिन नहीं करते
- इस बात का मलाल नहीं है कि दिल गया
- पूछा कि वज्ह-ए-ज़िंदगी बोले कि दिलदारी मिरी
- किसी बुत की अदा ने मार डाला
- असीर-ए-पंजा-ए-अहद-ए-शबाब कर के मुझे
- उस से कह दो कि वो जफ़ा न करे
- सहें कब तक जफ़ाएँ बेवफ़ाई देखने वाले
- जब कहा मैं ने कि मर मर के बचे हिज्र में हम
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ मुज़्तर ख़ैराबादी की ग़ज़लें हैं — ‘न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ’, ‘इलाज-ए-दर्द-ए-दिल तुम से मसीहा हो नहीं सकता’, ‘अगर तुम दिल हमारा ले के पछताए तो रहने दो’, ‘मेरे महबूब तुम हो यार तुम हो दिल-रुबा तुम हो’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।