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Mohammad Rafi Sauda Ghazal : मोहम्मद रफ़ी सौदा की ग़ज़लें

2024-12-07 · ग़ज़ल / शायरी

मिर्ज़ा मोहम्मद रफ़ी 'सौदा' (Mirza Mohammad Rafi Sauda) (1713–1781) शास्त्रीय उर्दू शायरी के शुरुआती दौर के सर्वाधिक प्रतिष्ठित उस्ताद शायर थे। उनका तख़ल्लुस ‘सौदा’ था। उन्होंने फ़ारसी से शायरी की शुरुआत कर उर्दू अदब को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। दिल्ली से लेकर फ़र्रुख़ाबाद और अवध दरबार तक अपनी ख़ास पहचान बनाने वाले सौदा ने जीवन का अंतिम दौर लखनऊ में गुज़ारा।

सौदा को विशेष रूप से क़सीदे, ग़ज़ल और शहर-आशोब का बादशाह माना जाता है। उनके क़सीदों में भाषा की भव्यता और अद्वितीय शब्द-सामर्थ्य दिखाई देता है, जबकि उनके शहर-आशोब तत्कालीन दिल्ली के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक उतार-चढ़ाव का सजीव दस्तावेज़ हैं। उनकी कालजयी शायरी और ग़ज़लें आज भी उर्दू काव्य-परंपरा के अनमोल रत्न मानी जाती हैं।

मिर्ज़ा मोहम्मद रफ़ी 'सौदा' की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Mohammad Rafi Sauda Ghazals)

इस पन्ने की ग़ज़लें

यहाँ मोहम्मद रफ़ी सौदा की ग़ज़लें हैं — ‘जब यार ने उठा कर ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे’, ‘jab yar ne uTha kar zulfon ke baal bandhe’, ‘गुल फेंके है औरों की तरफ़ बल्कि समर भी’, ‘gul phenke hai auron ki taraf balki samar bhi’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।

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