मिर्ज़ा मोहम्मद रफ़ी 'सौदा' (Mirza Mohammad Rafi Sauda) (1713–1781) शास्त्रीय उर्दू शायरी के शुरुआती दौर के सर्वाधिक प्रतिष्ठित उस्ताद शायर थे। उनका तख़ल्लुस ‘सौदा’ था। उन्होंने फ़ारसी से शायरी की शुरुआत कर उर्दू अदब को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। दिल्ली से लेकर फ़र्रुख़ाबाद और अवध दरबार तक अपनी ख़ास पहचान बनाने वाले सौदा ने जीवन का अंतिम दौर लखनऊ में गुज़ारा।
सौदा को विशेष रूप से क़सीदे, ग़ज़ल और शहर-आशोब का बादशाह माना जाता है। उनके क़सीदों में भाषा की भव्यता और अद्वितीय शब्द-सामर्थ्य दिखाई देता है, जबकि उनके शहर-आशोब तत्कालीन दिल्ली के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक उतार-चढ़ाव का सजीव दस्तावेज़ हैं। उनकी कालजयी शायरी और ग़ज़लें आज भी उर्दू काव्य-परंपरा के अनमोल रत्न मानी जाती हैं।
मिर्ज़ा मोहम्मद रफ़ी 'सौदा' की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Mohammad Rafi Sauda Ghazals)
- जब यार ने उठा कर ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे
- jab yar ne uTha kar zulfon ke baal bandhe
- गुल फेंके है औरों की तरफ़ बल्कि समर भी
- gul phenke hai auron ki taraf balki samar bhi
- वे सूरतें इलाही किस मुल्क बस्तियाँ हैं
- we suraten ilahi kis mulk bastiyan hain
- जो गुज़री मुझ पे मत उस से कहो हुआ सो हुआ
- jo guzri mujh pe mat us se kaho hua so hua
- आशिक़ की भी कटती हैं क्या ख़ूब तरह रातें
- aashiq ki bhi kaTti hain kya KHub tarah raaten
- हिन्दू हैं बुत-परस्त मुसलमाँ ख़ुदा-परस्त
- hindu hain but-parast musalman KHuda-parast
- गदा दस्त-ए-अहल-ए-करम देखते हैं
- gada dast-e-ahl-e-karam dekhte hain
- दिल मत टपक नज़र से कि पाया न जाएगा
- dil mat Tapak nazar se ki paya na jaega
- गर कीजिए इंसाफ़ तो की ज़ोर वफ़ा मैं
- gar kijiye insaf to ki zor wafa main
- बुलबुल ने जिसे जा के गुलिस्तान में देखा
- bulbul ne jise ja ke gulistan mein dekha
- अपने का है गुनाह बेगाने ने क्या किया
- apne ka hai gunah begane ne kya kiya
- गर तुझ में है वफ़ा तो जफ़ाकार कौन है
- gar tujh mein hai wafa to jafakar kaun hai
- हर संग में शरार है तेरे ज़ुहूर का
- har sang mein sharar hai tere zuhur ka
- चेहरे पे न ये नक़ाब देखा
- chehre pe na ye naqab dekha
- नसीम है तिरे कूचे में और सबा भी है
- nasim hai tere kuche mein aur saba bhi hai
- आराम फिर कहाँ है जो हो दिल में जा-ए-हिर्स
- aaram phir kahan hai jo ho dil mein ja-e-hirs
- दिलदार उस को ख़्वाह दिल-आज़ार कुछ कहो
- dildar usko KHwah dil-azar kuchh kaho
- तुझ क़ैद से दिल हो कर आज़ाद बहुत रोया
- tujh qaid se dil ho kar aazad bahut roya
- देखे बुलबुल जो यार की सूरत
- dekhe bulbul jo yar ki surat
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ मोहम्मद रफ़ी सौदा की ग़ज़लें हैं — ‘जब यार ने उठा कर ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे’, ‘jab yar ne uTha kar zulfon ke baal bandhe’, ‘गुल फेंके है औरों की तरफ़ बल्कि समर भी’, ‘gul phenke hai auron ki taraf balki samar bhi’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।