बशर नवाज़ (Bashar Nawaz) (1935–2015) आधुनिक उर्दू शायरी के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर, प्रसिद्ध कवि, पटकथा लेखक और गीतकार थे। उनका वास्तविक नाम बशारत नवाज़ ख़ान था और उनका जन्म औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में हुआ था। प्रगतिशील लेखक आंदोलन (Progressive Writers' Movement) से गहरे जुड़े बशर नवाज़ ने ग़ज़ल, नज़्म, रेडियो नाटक और हिंदी सिनेमा के लिए कालजयी गीत लिखे।
उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में राइगाँ और अजनबी समुंदर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जबकि नया अदब नए मसाइल उनकी गंभीर आलोचनात्मक कृति है। फ़िल्म बाज़ार का अमर गीत ‘करोगे याद तो हर बात याद आएगी’ उनकी सबसे लोकप्रिय रचनाओं में गिना जाता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रसिद्ध धारावाहिक अमीर ख़ुसरो तथा आकाशवाणी के लिए भी उत्कृष्ट पटकथा और संवाद लिखे।
बशर नवाज़ की मशहूर ग़ज़लें (Popular Ghazals of Bashar Nawaz)
- रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे
- roz kahan se koi naya-pan apne aap mein laenge
- चुप-चाप सुलगता है दिया तुम भी तो देखो
- chup-chap sulagta hai diya tum bhi to dekho
- बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया
- bahut tha KHauf jis ka phir wahi qissa nikal aaya
- आहट पे कान दर पे नज़र इस तरह न थी
- aahaT pe kan dar pe nazar is tarah na thi
- हर नई रुत में नया होता है मंज़र मेरा
- har nai rut mein naya hota hai manzar mera
- घटती बढ़ती रौशनिय्यों ने मुझे समझा नहीं
- ghaTti baDhti raushniyon ne mujhe samjha nahin
- अक्स हर रोज़ किसी ग़म का पड़ा करता है
- aks har roz kisi gham ka paDa karta hai
- जाने क्या देखा था मैं ने ख़्वाब में
- jaane kya dekha tha maine KHwab mein
- जब छाई घटा लहराई धनक इक हुस्न-ए-मुकम्मल याद आया
- jab chhai ghaTa lahrai dhanak ek husn-e-mukammal yaad aaya
- क्या क्या लोग ख़ुशी से अपनी बिकने पर तय्यार हुए
- kya kya log KHushi se apni bikne par tayyar hue
- कोई सनम तो हो कोई अपना ख़ुदा तो हो
- koi sanam to ho koi apna KHuda to ho
- दिल के हर दर्द ने अशआ'र में ढलना चाहा
- dil ke har dard ne ashaar mein Dhalna chaha
- रब्त हर बज़्म से टूटे तिरी महफ़िल के सिवा
- rabt har bazm se TuTe teri mahfil ke siwa
- बाज़ार-ए-ज़िंदगी में जमे कैसे अपना रंग
- bazar-e-zindagi mein jame kaise apna rang
- जब कभी होंगे तो हम माइल-ए-ग़म ही होंगे
- jab kabhi honge to hum mail-e-gham hi honge
- छेड़ा ज़रा सबा ने तो गुलनार हो गए
- सारे मंज़र फ़ुसूँ तमाशा हैं
- sare manzar fusun tamasha hain
- ये हुस्न है झरनों में न है बाद-ए-चमन में
- ye husn hai jharnon mein na hai baad-e-chaman mein
- ब-हर-उनवाँ मोहब्बत को बहार-ए-ज़िंदगी कहिए
- ba-har-unwan mohabbat ko bahaar-e-zindagi kahiye
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ बशर नवाज़ की ग़ज़लें हैं — ‘रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे’, ‘roz kahan se koi naya-pan apne aap mein laenge’, ‘चुप-चाप सुलगता है दिया तुम भी तो देखो’, ‘chup-chap sulagta hai diya tum bhi to dekho’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।