परिचय
संत सुंदरदास (1596–1689) भक्तिकाल की निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य धारा) के अत्यंत सुशिक्षित, शास्त्रज्ञ और विशिष्ट संत-कवि थे। वे दादू दयाल जी के प्रमुख शिष्यों में अग्रणी थे और उन्होंने काशी में रहकर व्याकरण, दर्शन तथा वेदांत का गहन अध्ययन किया था। संत कवियों में वे अकेले ऐसे कवि थे जिन्होंने सवैया, कवित्त और शास्त्रीय छंदों का अत्यंत प्रौढ़, परिष्कृत और कलात्मक प्रयोग किया। बाह्याडंबरों पर तीखा व्यंग्य, ज्ञान-वैराग्य और समाज-सुधार इनकी रचनाओं का मुख्य आधार है।
संत सुंदरदास के सवैये एवं प्रमुख रचनाएँ
- पाव पताल परे गये नीकसि / सुंदरदास
- तीनहुं लोक अहार कियौ / सुंदरदास
- प्रेत भयौ कि पिशाच भयौ / सुंदरदास
- कोउ बिभूति जटा नख धारि / सुंदरदास
- ये मेरे देश बिलाइति हैं गज / सुंदरदास
- संत सदा उपदेश बतावत / सुंदरदास
- तैं दिन च्यारि बिराम लियौ / सुंदरदास
- जौ खपरा कर लै घर डोलत / सुंदरदास
- तात मिलै पुनि मात मिलै / सुंदरदास
- पेट तें बाहिर होतहि बालक / सुंदरदास
- मात पिता सुत भाई बंध्यौ / सुंदरदास
- आसन मारि सँवारि जटा / सुंदरदास
- कोउक निंदत कोउक बंदत / सुंदरदास
- ऊरध पाइ अधौमुख ह्वै करि / सुंदरदास
- भौजल मैं बहि जात हुते जिनि / सुंदरदास
- जीवन परिचय / सुंदरदास