परिचय
श्रीभट्ट जी भक्तिकाल की निंबार्क संप्रदाय परंपरा के अत्यंत प्रतिष्ठित संत-कवि और 'युगल शतक' के अमर रचयिता थे। वे स्वामी केशव कश्मीरी भट्ट जी के प्रमुख शिष्य थे और ब्रजभाषा में मधुर युगल उपासना के प्रवर्तक माने जाते हैं। इनकी वाणी में राधा-कृष्ण के नित्य विहार, निकुंज लीला और सखी भाव की अनुपम, विशुद्ध भक्ति के दर्शन होते हैं। श्रीभट्ट जी के पदों और दोहों की सरस संगीतात्मकता ने उत्तर-मध्यकालीन ब्रजभाषा साहित्य को एक दिव्य माधुर्य प्रदान किया।
श्रीभट्ट के पद, दोहे एवं प्रमुख रचनाएँ
- श्रीभट्ट के दोहे / Shribhatt ke Dohe
- श्रीभट्ट के पद / Shribhatt ke Pad
- स्यामा-स्याम पद पावै सोई / श्रीभट्ट
- बसौ मेरे नैननि में दोऊ चंद / श्रीभट्ट
- ब्रजभूमि मोहिनी मैं जानी / श्रीभट्ट
- जुगलकिशोर हमारे ठाकुर / श्रीभट्ट
- मदनगुपाल, सरन तेरी आयो / श्रीभट्ट
- हिंडोरौ झूलति हैं पियप्यारी / श्रीभट्ट
- सेव्य हमारे हैं प्रिय प्यारे / श्रीभट्ट
- जीवन परिचय / श्रीभट्ट