परिचय
श्री हठी जी भक्तिकाल एवं रीतिकाल की राधावल्लभीय संप्रदाय परंपरा के अत्यंत भावुक और प्रतिष्ठित संत-कवि थे। वे श्री हरिवंश महाप्रभु की अनन्य उपासना और निकुंज रस के अनन्य उपासक माने जाते हैं, जिनकी अमर कृति 'राधा सुधा शतक' साहित्य जगत में प्रसिद्ध है। इनकी रचनाओं में श्रीराधा रानी की नित्य लाड़-लड़ावनी लीला, अलौकिक रूप-सौंदर्य और अनन्य शरणागति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। ब्रजभाषा के सवैया और दोहों में रचित इनकी पदावली में माधुर्य, भक्ति और काव्य-सौष्ठव का अद्वितीय प्रवाह है।
श्री हठी जी की प्रमुख रचनाएँ, दोहे व सवैया
- श्री हठी के दोहे / श्री हठी
- श्री हठी के सवैया / श्री हठी
- चंद-सो आनन, कंजन-सो तन / श्री हठी
- मोरपखा, गर गुंज की माल / श्री हठी
- जाकी कृपा सुक ग्यानी भये / श्री हठी
- नवीनत गुलाब तें कोमल हैं / श्री हठी
- हीन हौं, अधीन हौं तिहारो ब्रज-साहिबनी / श्री हठी
- चंद की कला-सी, नवला-सी सखी संगबारी / श्री हठी
- ध्यावत महेसहूं गनेसहूं धनेसहूं / श्री हठी
- काहू कों सरन संभु गिरिजा गनेस सेस / श्री हठी
- फटिकसिलान के महल महारानी बैठी / श्री हठी
- कोमल विमल मञ्जु कंज-से अरुन सोहैं / श्री हठी
- कोऊ उमाराज रमाराज, जमाराज कोऊ / श्री हठी