परिचय
महाराजा मानसिंह (1783–1843) मारवाड़ (जोधपुर) के प्रतापी शासक, उच्चकोटि के विद्वान और नाथ संप्रदाय के परम साधक कवि थे। वे महाप्रभु आयस देवनाथ जी के अनन्य शिष्य थे और उन्होंने स्वयं 'जालंधर ज्ञान सागर' तथा 'नाथ रहस्य' जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का प्रणयन किया। उनकी वाणी में राजसी वैभव के त्याग, आध्यात्मिक वैराग्य, हठयोग साधना और ईश्वर-प्रेम का अनुपम संगम दिखाई देता है। मारवाड़ी एवं डिंगल-मिश्रित ब्रजभाषा में रचित उनके पद राजस्थान के संत-साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।
महाराजा मानसिंह के प्रमुख पद एवं नाथ वाणी
- चालो उण देश में रे जोगिया / महाराजा मानसिंह
- चाल सखी उण देश में / महाराजा मानसिंह
- छीलारियों में कुण न्हावे / महाराजा मानसिंह
- फकीरी असल फकीरी और / महाराजा मानसिंह
- फकीरी कायर सूँ कद होय / महाराजा मानसिंह
- जोग पंथ है झीणो / महाराजा मानसिंह
- लखो निज श्याम ने रे जोगिया / महाराजा मानसिंह
- मिथ्या मैं तो भटक मर / महाराजा मानसिंह
- सुण रे भँवर सैलाणी / महाराजा मानसिंह
- सूता सारंगधर जोग में रे / महाराजा मानसिंह