परिचय
रीतिकाल के प्रमुख कवियों में लाल कवि (गोरेलाल पुरोहित) का स्थान अत्यंत विशिष्ट और महत्वपूर्ण है। वे बुंदेलखंड के प्रतापी महाराज छत्रसाल के आश्रयदाता कवि थे और उनकी रचनाओं में वीर रस के साथ-साथ उत्कृष्ट प्रकृति चित्रण व भक्ति भाव देखने को मिलता है। इनका प्रबंध काव्य 'छत्रप्रकाश' ऐतिहासिक दृष्टि से अनमोल ग्रंथ माना जाता है। लाल कवि की भाषा ब्रजभाषा है, जिसमें ओज, माधुर्य और लोक-जीवन के सजीव बिंबों का सुंदर समन्वय मिलता है।
लाल कवि के प्रसिद्ध पद एवं रचनाएँ
- छाये नभमंडल में, सलज सघन घन / लाल कवि
- वन प्रभु पुंजन में, मालती निकुंजन में / लाल कवि
- होन लागे केकी, कुहकार कुंज कानन में / लाल कवि
- लाल लिखौ पावस प्रताप जगती तल पैं / लाल कवि
- सिंधु के सपूत, सिंधु तनया के बंधु / लाल कवि
- बड़भाग सुहाग भरी पिय सों / लाल कवि