परिचय
कवि खुमान बंदीजन रीतिकाल के उत्तरार्ध के एक अत्यंत समर्थ, ओजस्वी और बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि थे। वे चरखारी (बुंदेलखंड) नरेश महाराज रतनसिंह और महाराज विजयसिंह के दरबारी कवि व बंदीजन रहे। इनकी रचनाओं में वीर, रौद्र और अद्भुत रस के साथ-साथ उत्कृष्ट आलंकारिकता, सवैया व कवित्त छंद का अनुपम प्रवाह देखने को मिलता है। 'लक्ष्मण शतक' और 'रतन-हज़ारा' जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने रीतिकालीन काव्य-परंपरा को विशिष्ट पहचान दिलाई।
खुमान बंदीजन का काव्य : कवित्त एवं सवैया
- खुमान बंदीजन का काव्य व सवैया
- भोजन पीछे सदा हीं करै फल / खुमान बंदीजन
- खुमान बंदीजन के कवित्त
- गत्थन अकत्थ समरत्थ दसरत्थसुत / खुमान बंदीजन
- मोतें बलवान लंकनाथ है निदान सुनि / खुमान बंदीजन
- रिच्छकुल-कंत कह्यौ रच्छकुलकंत वाही / खुमान बंदीजन
- पारावार परी तेज भरी लखि साँग क्रुद्ध / खुमान बंदीजन
- कपिदल-पति बेर-बेर बिलपत / खुमान बंदीजन
- उडी धूरि धायौ पंक पारापार फूटि-टूटि / खुमान बंदीजन
- इत चढ्यौ रामबंधु कपि कटक प्रबंध / खुमान बंदीजन
- प्रज्वलित ज्वाल प्रलै-ज्वालन की दोपति / खुमान बंदीजन
- धिग हनुमान को अमान बलवान घम / खुमान बंदीजन
- मीड्यो महाकाल सो कराल बंधकाल प्रलै / खुमान बंदीजन
- उठो बिकराल इंद्रजीत को सो काल रन / खुमान बंदीजन
- भूप दसरत्थ को नवेलो अलबेलो रन / खुमान बंदीजन
- महाबाहू भूप दसरत्थ को कुमार / खुमान बंदीजन
- प्रलैकाल प्रलै पवमान प्रलै भानु प्रलै / खुमान बंदीजन
- प्यारो सीताराम को उज्यारो रघुबंस को / खुमान बंदीजन
- सबै गिरिबेली दीपसेली सी नबेली चंद / खुमान बंदीजन
- करोर रच्छ रोर बच्छ फोर बाहु तोर घोर / खुमान बंदीजन
- फन-पति-फन फुफकान से फटे से जात / खुमान बंदीजन