परिचय
जांभोजी (1451–1536) राजस्थान के मध्यकालीन संत और धार्मिक गुरु थे। उनका जन्म नागौर क्षेत्र के पीपासर गाँव में माना जाता है। उन्होंने 15वीं शताब्दी में विश्नोई संप्रदाय की स्थापना की और लोगों को जीव-दया, पर्यावरण संरक्षण तथा सदाचार का संदेश दिया। जांभोजी की शिक्षाएँ उनके अनुयायियों में 29 नियमों के रूप में प्रचलित हैं। उनकी वाणी में भक्ति, नैतिक जीवन, प्रकृति-प्रेम और सामाजिक अनुशासन पर विशेष बल मिलता है।
जांभोजी महाराज के लिखित पद : Jambhoji Maharaj Ke Likhit Pad
जां कुछ जां कुछ कछू न जाणी
जां कुछ जां कुछ कछू न जाणी, ना कुछ ना कुछ तां कछु जाणी।
ना कुछ ना कुछ अकथ कहांणी, ना कुछ ना कुछ अमृत वाणी।
ज्ञानी सो तो ज्ञानी रोवत, पढ़िया रोवत गाहै।
केल करंता मोरी मोरा रोवत, जोय जोय पगां दिखाही।
उर्ध खैंणी मन उन्मन रोवत, मुरखा रोवत-धार्ही।
मरणत माघ संघारत खेती, के के अवतारी रोवत राही।
जड़िया बूंटी जे जग जीवै, तो! बैदा क्यों मरजाई।
खोज प्राणी अैसा बिनाणी, नुगरा खोजत नाहीं ।
जां कुछ होता ना कुछ होयसी, बल कुछ होयसी ताही॥
- आद शब्द अनाहद वाणी / जांभोजी
- बल बल भणत व्यासूं / जांभोजी
- जोगी रे तू जुगत पिछाणी / जांभोजी
- ज्यों राज गए राजेन्दर झूरे / जांभोजी
- काजी कथे कुराणों / जांभोजी
- कोट गऊ जे तीरथ दानों / जांभोजी
- रूप अरूप रमू पिंडे ब्रह्मांडे / जांभोजी
- साल्हिया हुवा मरण भय भागा / जांभोजी
- वाद विवाद फिटा कर प्राणी / जांभोजी
- विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै / जांभोजी