परिचय
गोस्वामी हितहरिवंश महाप्रभु (1502–1552) ब्रज के राधावल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक, महान संत और भक्तिकाल की रसोपासना धारा के मूर्धन्य कवि थे। उनका जन्म मथुरा के निकट बाद ग्राम में हुआ था और उन्होंने वृंदावन को अपनी साधना व निकुंज उपासना का केंद्र बनाया। उन्होंने श्री राधा को ही आराध्य और प्रेम की पराकाष्ठा मानकर अनन्य भाव से 'हित चौरासी' और 'स्फुट वाणी' जैसे अमर पदों की रचना ब्रजभाषा में की। उनके रचे पद, दोहे और छप्पय प्रेम-रस, माधुर्य भक्ति और आत्म-निवेदन के अप्रतिम उदाहरण हैं, जो सदियों से रसिक जनों के कंठहार बने हुए हैं।
हितहरिवंश जी के पद, दोहे व रचनाएँ | Hit Harivansh Rachna Sangrah
- हितहरिवंश के दोहे
- हितहरिवंश के पद (वाणी संग्रह)
- रहौ कोऊ काहू मनहि दियें / हितहरिवंश पद
- सुनि मेरो बचन छबीली राधा / हितहरिवंश पद
- आरति कीजै स्यामसुन्दर की / हितहरिवंश पद
- मोहनलाल के रंग राँची / हितहरिवंश पद
- आजु बन नीको रास बनायौ / हितहरिवंश पद
- सरद बिमल, नभ चंद बिराजै / हितहरिवंश पद
- ताते भैया, मेरी सौं, कृष्णगुन संचु / हितहरिवंश पद
- मानुष कौ तन पाइ भजौ ब्रजनाथ कों / हितहरिवंश पद
- देखौ भाई, सुंदरता की सींवा / हितहरिवंश पद
- ब्रज-नव-तरुनि-कदंब-मुकुट मनि / हितहरिवंश पद
- मधुरितु बृंदाबन आनंद न थोर / हितहरिवंश पद
- हितहरिवंश प्रपंच वंच / हितहरिवंश पद
- जोई-जोई प्यारो करैं / हितहरिवंश पद
- प्रीति न काहु कि कानि बिचारै / हितहरिवंश पद
- आजु नीकी बनी राधिका नागरी / हितहरिवंश पद
- हितहरिवंश की कुंडलियाँ
- चकई प्रान जु घट रहै / हितहरिवंश
- हितहरिवंश के छप्पय
- तैं भाजन कृत जटित बिमल / हितहरिवंश
- हितहरिवंश जी का परिचय (Hit Harivansh Parichay)