परिचय
गदाधर भट्ट (16वीं शताब्दी) भक्तिकाल की गौड़ीय वैष्णव शाखा के अत्यंत आदरणीय और प्रमुख भक्त-कवि थे, जिनका जन्म दक्षिण भारत में हुआ था लेकिन उन्होंने वृंदावन को अपनी साधना-स्थली बनाया। वे श्री चैतन्य महाप्रभु के अनन्य अनुयायी थे और वृंदावन के प्रसिद्ध मदनमोहन जी मंदिर से उनका गहरा संबंध रहा। ब्रजभाषा और संस्कृत पर उनका असाधारण अधिकार था; उनके पदों में राधा-कृष्ण के युगल रूप, निकुंज-लीला और अनन्य शरणागति का अनुपम माधुर्य झलकता है। ‘सखी, हौं स्याम रंग रँगी’ जैसे उनके अमर पद आज भी वैष्णव संतों और ब्रज रसियाओं के कंठहार हैं।
गदाधर भट्ट के प्रमुख पद व रचनाएँ
- सखी, हौं स्याम रंग रँगी / गदाधर भट्ट
- दिन दूलह मेरो कुँवर कन्हैया / गदाधर भट्ट
- श्रीगोबिन्द पद-पल्लव सिर पर बिराजमान / गदाधर भट्ट
- नमो नमो जय श्रीगोबिंद / गदाधर भट्ट
- हरि हरि हरि हरि रट रसना मम / गदाधर भट्ट
- है हरितें हरिनाम बड़ेरो / गदाधर भट्ट
- कबै हरि, कृपा करिहौ सुरति मेरी / गदाधर भट्ट
- जयति श्रीराधिके सकलसुखसाधिके / गदाधर भट्ट
- जय महाराज ब्रजराज-कुल-तिलक / गदाधर भट्ट
- झूलत नागरि नागर लाल / गदाधर भट्ट
- आजु ब्रजराजको कुँवर बनते बन्यो / गदाधर भट्ट
- सुंदर स्याम सुजानसिरोमनि / गदाधर भट्ट
- गदाधर भट्ट जीवन परिचय