परिचय
संत चेतनदास (1733–1777) हाड़ौती अंचल के प्रतिष्ठित संत-कवि एवं रामस्नेही संप्रदाय की निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभ थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में राम-नाम सिमरन, गुरु-महिमा, संसार की नश्वरता और वैराग्य भाव का अत्यंत मार्मिक व सहज निरूपण किया है। इनकी कुंडलियाँ, साखियाँ और पद हाड़ौती व राजस्थानी मिश्रित भाषा में जनमानस को आध्यात्मिक चेतना का बोध कराते हैं। क्षेत्रीय संत साहित्य और लोक-भक्ति परंपरा में चेतनदास जी का स्थान अत्यंत आदरणीय एवं महत्वपूर्ण माना जाता है।
चेतनदास जी की प्रमुख रचनाएँ : कुंडलियाँ, साखी व पद
- चेतनदास जी की कुंडलियाँ / Chetandas Ji Ri Kundaliyan
- जग धूतै रांडां करै ब्याज चलावै दाम / चेतनदास
- झूठौ सुख संसार को चेतन सो थिरि नाहिं / चेतनदास
- माया में मां नीसरै ग्रिह सूं होय उदास / चेतनदास
- सतगुरु का परताप की महिमा अगम अपार / चेतनदास
- चेतनदास जी की साखी / Chetandas Ji Sakhi Sangrah
- नाम निरणै को अंग / चेतनदास
- प्रेमप्रकास को अंग / चेतनदास
- विनती को अंग / चेतनदास
- विरह को अंग / चेतनदास
- चेतनदास जी के पद / Chetandas Ji Ke Pad
- पलक माहिं मर जाणा प्राणी / चेतनदास
- राम बिना को तेरा, यो जग जम का घेरा / चेतनदास