परिचय
महाराव बुद्धसिंह हाड़ा (1695–1739) राजस्थान के हाड़ौती अंचल में बूंदी राज्य के प्रतापी नरेश, कुशल योद्धा और रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि थे। वे युद्धकला में जितने निपुण थे, साहित्य और ब्रजभाषा काव्य में उनका अनुराग उतना ही प्रगाढ़ था। उनकी प्रसिद्ध काव्य-रचना ‘नेहरंग’ शृंगार और प्रेम-निरूपण की दृष्टि से रीतिकालीन ब्रजभाषा साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। बुद्धसिंह हाड़ा के सवैया और कवित्त छंदों में भावों की सहजता, नाद-सौंदर्य और शास्त्रीय परिपक्वता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
बुद्धसिंह हाड़ा के कवित्त छंद
- बुद्धसिंह हाड़ा के कवित्त / Kavitt Buddha Singh Hada
- ऐसी यह रीति सौं लुभानै / बुद्धसिंह हाड़ा
- भोर पति संग ते ससंक अंक 'जोर आली' / बुद्धसिंह हाड़ा
- चन्द्र कों चकोर ज्यौं / बुद्धसिंह हाड़ा
- चन्द्र कों चकोर ज्यौं दिवाकर कों चक्रवाक / बुद्धसिंह हाड़ा
- एक समैं हरि राधिका सौं / बुद्धसिंह हाड़ा
- एक वोर मगा गगो / बुद्धसिंह हाड़ा
- जा दिन तैं लगे नैंन तिहारे / बुद्धसिंह हाड़ा
- प्रीति के उपायन सौं / बुद्धसिंह हाड़ा
- प्रीति के उपायन सौं भांति-भांति भायन सौं / बुद्धसिंह हाड़ा
- सरद के चन्द्रमा सौ राजत बदन-चंद / बुद्धसिंह हाड़ा
बुद्धसिंह हाड़ा के सवैया छंद
- बुद्धसिंह हाड़ा के सवैया छंद / Savaiyya Buddha Singh Hada
- आज लसै ब्रजनारी सबै / बुद्धसिंह हाड़ा
- आजु कछूं बलि राधिका सौं / बुद्धसिंह हाड़ा
- आजु कहौं फिरि काल्हि कहौं / बुद्धसिंह हाड़ा
- आजु मैं देखी है गोपसुता मुख / बुद्धसिंह हाड़ा
- अंजन मंजन कैं दृग-रंजन / बुद्धसिंह हाड़ा
- हौं पठई कबकी मत लैंन / बुद्धसिंह हाड़ा
- जा दिन तैं भये रावरैं मांन / बुद्धसिंह हाड़ा
- केती मजूरी सुधारी कमांन / बुद्धसिंह हाड़ा
- मंद भयौ पियकौ मुख चंदसौ / बुद्धसिंह हाड़ा
- प्रातहु तैं मुख पांन दये नहि / बुद्धसिंह हाड़ा
- राधे सौं आजु कछु नंदनंदन / बुद्धसिंह हाड़ा
- राधिके रोस मैं आजु लखी / बुद्धसिंह हाड़ा
- रैनि समैं सलिता मधि मैं / बुद्धसिंह हाड़ा
- राति के जागत ही बृजचंद / बुद्धसिंह हाड़ा
- रावरी बातैं सुभायकैं भाय सौं / बुद्धसिंह हाड़ा
- स्यांम-सरीर लसै पट पीत / बुद्धसिंह हाड़ा