ज़फ़र इक़बाल (Zafar Iqbal) (जन्म 27 सितंबर 1932) आधुनिक उर्दू शायरी के अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट शायर हैं। उनका जन्म बहावलनगर में हुआ और शुरुआती शिक्षा ओकारा में पूरी करने के बाद उन्होंने लाहौर से उच्च शिक्षा प्राप्त की। पेशे से वरिष्ठ अधिवक्ता रहे ज़फ़र इक़बाल ने दशकों तक प्रतिष्ठित उर्दू अख़बारों में नियमित स्तंभकार के रूप में भी साहित्य व समाज पर बेबाक टिप्पणियाँ लिखीं।
उर्दू ग़ज़ल को पारंपरिक सीमाओं से मुक्त कर आधुनिक संवेदना, रोज़मर्रा की बोलचाल और नए भाषाई मुहावरों से समृद्ध करने का श्रेय उन्हें जाता है। उनकी कालजयी काव्य-कृतियों में ‘आब-ए-रवाँ’, ‘अहद-ए-ज़ियाँ’, ‘बादा-ए-ख़य्याम’, ‘गुलआफ़्ताब’ और ‘अब तक’ प्रमुख हैं। साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें 1999 में प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस और 2014 में पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान हिलाल-ए-इम्तियाज़ से सम्मानित किया गया।
ज़फ़र इक़बाल की मशहूर ग़ज़लें (Zafar Iqbal Best Ghazals List)
- ख़ामुशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए
- थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते
- बस एक बार किसी ने गले लगाया था
- ज़फ़र इक़बाल की प्रतिनिधि ग़ज़लें
- यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला
- नहीं कि तेरे इशारे नहीं समझता हूँ
- कब वो ज़ाहिर होगा और हैरान कर देगा मुझे
- अभी किसी के न मेरे कहे से गुज़रेगा
- जैसी अब है इसी हालत में नहीं रह सकता
- यूँ भी होता है कि यक दम कोई अच्छा लग जाए
- अभी आँखें खुली हैं और क्या क्या देखने को
- आग का रिश्ता निकल आए कोई पानी के साथ
- बात ऐसी भी कोई नहीं कि मोहब्बत बहुत ज़ियादा है
- पाए हुए इस वक़्त को खोना ही बहुत है
- यूँ भी नहीं कि शाम-ओ-सहर इंतिज़ार था
- यकसू भी लग रहा हूँ बिखरने के बावजूद
- ख़ुशी मिली तो ये आलम था बद-हवासी का
- ये भी मुमकिन है कि आँखें हों तमाशा ही न हो
- किस नए ख़्वाब में रहता हूँ डुबोया हुआ मैं
- न उस को भूल पाए हैं न हम ने याद रक्खा है
- देखो तो कुछ ज़ियाँ नहीं खोने के बावजूद
- मैं ने कब दावा किया था सर-ब-सर बाक़ी हूँ मैं
- ख़ुश बहुत फिरते हैं वो घर में तमाशा कर के
- सिमटने की हवस क्या थी बिखरना किस लिए है
- ये बात अलग है मिरा क़ातिल भी वही था
- बेवफ़ाई करके निकलूँ या वफ़ा कर जाऊँगा
- भूल बैठा था मगर याद भी ख़ुद मैं ने किया
- अगर इस खेल में अब वो भी शामिल होने वाला है
- एक ही बार नहीं है वो दुबारा कम है
- अभी तो करना पड़ेगा सफ़र दोबारा मुझे
- कभी अव्वल नज़र आना कभी आख़िर होना
- लहर की तरह किनारे से उछल जाना है
- खिड़कियाँ किस तरह की हैं और दर कैसा है वो
- चलो इतनी तो आसानी रहेगी
- मेरे अंदर वो मेरे सिवा कौन था
- छुपा हुआ जो नुमूदार से निकल आया
- यूँ तो किस चीज़ की कमी है
- दरिया दूर नहीं और प्यासा रह सकता हूँ
- नहीं कि दिल में हमेशा ख़ुशी बहुत आई
- कुछ नहीं समझा हूँ इतना मुख़्तसर पैग़ाम था
- सिर्फ़ आँखें थीं अभी उन में इशारे नहीं थे
- बिजली गिरी है कल किसी उजड़े मकान पर
- कुछ सबब ही न बने बात बढ़ा देने का
- जो बंदा-ए-ख़ुदा था ख़ुदा होने वाला है
- ऐसा वो बे-शुमार-ओ-क़तार इंतिज़ार था
- हमें भी मतलब-ओ-मअ'नी की जुस्तुजू है बहुत
- न गुमाँ रहने दिया है न यक़ीं रहने दिया
- बहुत सुलझी हुई बातों को भी उलझाए रखते हैं
- वो एक तरहा से इक़रार करने आया था
- लर्ज़िश-ए-पर्दा-ए-इज़हार का मतलब क्या है
- तक़ाज़ा हो चुकी है और तमन्ना हो रहा है
- KHamushi achchhi nahin inkar hona chahiye
- thakna bhi lazmi tha kuchh kaam karte karte
- bas ek bar kisi ne gale lagaya tha
- yahan kisi ko bhi kuchh hasb-e-arzu na mila
- nahin ki tere ishaare nahin samajhta hun
- kab wo zahir hoga aur hairan kar dega mujhe
- abhi kisi ke na mere kahe se guzrega
- jaisi ab hai isi haalat mein nahin rah sakta
- yun bhi hota hai ki yak dam koi achchha lag jae
- abhi aankhen khuli hain aur kya kya dekhne ko
- aag ka rishta nikal aae koi pani ke sath
- baat aisi bhi koi nahin ki mohabbat bahut ziyaada hai
- pae hue is waqt ko khona hi bahut hai
- yun bhi nahin ki sham-o-sahar intizar tha
- KHushi mili to ye aalam tha bad-hawasi ka
- chhupa hua jo numudar se nikal aaya
- yun to kis chiz ki kami hai
- dariya dur nahin aur pyasa rah sakta hun
- nahin ki dil mein hamesha KHushi bahut aai
- kuchh nahin samjha hun itna muKHtasar paigham tha
- sirf aankhen thin abhi un mein ishaare nahin the
- bijli giri hai kal kisi ujDe makan par
- jo banda-e-KHuda tha KHuda hone wala hai
- kuchh sabab hi na bane baat baDha dene ka
- aisa wo be-shumar-o-qatar intizar tha
- na guman rahne diya hai na yaqin rahne diya
- bahut suljhi hui baaton ko bhi uljhae rakhte hain
- hamein bhi matlab-o-mani ki justuju hai bahut
- larzish-e-parda-e-izhaar ka matlab kya hai
- wo ek tarha se iqrar karne aaya tha
- taqaza ho chuki hai aur tamanna ho raha hai
इस पन्ने की ग़ज़लें
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