यार मुहम्मद, जिन्हें साहित्य में यारी साहब के नाम से जाना जाता है, रीतिकाल के निर्गुण संत-कवियों में गिने जाते हैं। उनका संबंध बावरी संप्रदाय से था और उपलब्ध स्रोतों के अनुसार वे दिल्ली में रहे। उनके गुरु के रूप में वीरू साहब का नाम मिलता है, जबकि बूला साहब उनके प्रमुख शिष्यों में थे।
यारी साहब की कविता में निर्गुण साधना के साथ सूफी प्रभाव और योग संबंधी संकेतों का सुंदर मेल दिखाई देता है। वे ईश्वर को किसी बाहरी स्थान के बजाय मनुष्य के भीतर खोजने की बात करते हैं। दोहे, सबद और कवित्त उनके उपलब्ध काव्य-रूप हैं। उनकी भाषा में अरबी-फारसी शब्दों के साथ लोकप्रचलित हिंदी का प्रयोग मिलता है। ‘बिरहिनी मंदिर दियना बार’ जैसे पदों में आत्मा और परमात्मा के मिलन को विरह तथा प्रेम के रूपक में व्यक्त किया गया है। ‘यारी साहब की रत्नावली’ उनके काव्य का प्रमुख संग्रह है।
यारी साहब के सबद
- जोगी जुगति जोग कमाव
- हमारे एक अलह पिय प्यारा है
- सतगुरु है सतपुरुष अकेला
- रसना राम कहत तें थाको
- बिरहिनी मंदिर दियना बार
- उड़ु उड़ु रे बिहंगम चढ़ु अकास
- झिलमिल झिलमिल बरखै नूरा
- गावै गगन तान सुनियत बिना कान
- देखु बिचारि हिये अपने नर
- आँधरे को हाथी हरि हाथ जा को जैसो आयो
- गुरु के चरन की राज लै के
- धरती मिली आकास को रे
- दोउ मूँदि के नैन अंदर देखा
- गगन गुफा में बैठि के रे
- जहँ रूप न रेख न रंग है रे
- एक कहो सो अनेक ह्वै दीसत
- गहने के गढ़े तें सोनो भी जातु है
- जमीं बरखै आसमान भींजै
- दिन-दिन प्रीति अधिक मोहिं हरि की
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