संत वेणी मध्यकालीन संत-काव्य के उन कवियों में हैं जिनके जीवन से अधिक उनकी उपलब्ध वाणी महत्वपूर्ण है। उनके जन्मस्थान और निश्चित काल के बारे में विद्वानों में एकमत नहीं है, हालांकि उन्हें गुरु नानक के आसपास के समय का संत माना जाता है। गुरु ग्रंथ साहिब में उनके तीन पद सुरक्षित हैं, जिनसे उनके आध्यात्मिक चिंतन का परिचय मिलता है।
वेणी के पदों में साधना, गुरु-ज्ञान, आत्मचिंतन और ईश्वर-स्मरण के साथ योगपरक शब्दावली का भी प्रयोग हुआ है। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना जैसे संकेतों के माध्यम से उन्होंने बाहरी तीर्थ के बजाय मनुष्य के भीतर स्थित आध्यात्मिक अनुभव की ओर ध्यान दिलाया। उनके काव्य में अनहद नाद और अंतर्मुखी साधना की चर्चा भी मिलती है। भाषा और विचार दोनों स्तरों पर संत वेणी की रचनाएँ मध्यकालीन संत परंपरा और नाथ-योग की धारणाओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी दिखाई देती हैं।