तुरसीदास निरंजनी निरंजनी संप्रदाय के प्रमुख संत-कवि, साधक और विचारक थे। वे ज्ञान, भक्ति और योग के साथ रहस्यवादी साधना के समर्थ कवि माने जाते हैं। उनकी वाणी में आत्मशुद्धि, गुरु-भक्ति, राम-नाम, विरह और प्रेम के साथ निर्गुण-सगुण ब्रह्म के विचार भी मिलते हैं। विद्वान पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने उन्हें निरंजनपंथ के दार्शनिक सिद्धांतों का प्रमुख प्रतिपादक माना है।
तुरसीदास निरंजनी के सबद और वाणी
- धनि-धनि पीव की राजधानी हो
- आवो री सखी हो मिली गोविंद गावै
- बिचालै नदी बहै जी
- हरि बिन ए दिन जात दुखारे
- रमईया तुम बिन रह्यो न जाइ
- जग सूं प्रीति करे जिनि कोइ
- मन बनिजारा रे भाई
- बादल बरसन लागै दोइ
- भली भई ज्ञान प्रकास भयौ
- चलौ जीव हमारा
- अब मैं आयो सरन तुम्हारी
- ऐसो ज्ञान बिचारहु रे