तुलसी साहब (1763–1843) हिंदी संत साहित्य की रहस्यवादी धारा के प्रमुख संत-कवि थे। उनका जन्म पुणे में हुआ था और जीवन का एक बड़ा हिस्सा आध्यात्मिक साधना तथा आत्मज्ञान की खोज में बीता। वे ‘साहिब पंथ’ से संबंधित माने जाते हैं। बाद में वे उत्तर भारत के हाथरस में रहे, जहाँ उनकी साधना और वाणी से प्रभावित अनेक लोग उनके संपर्क में आए।
तुलसी साहब की वाणी में बाहरी कर्मकांड की अपेक्षा आंतरिक साधना, गुरु-महिमा, नाम-स्मरण और आत्मज्ञान पर विशेष जोर मिलता है। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘घट रामायण’, ‘रत्नसागर’, ‘शब्दावली’ और ‘पद्मसागर’ का उल्लेख मिलता है। उनके पदों और सबदों में रहस्यवादी अनुभूति, विरह और आत्मिक खोज के भाव सहज भाषा में व्यक्त हुए हैं।
तुलसी साहब के सबद और संत वाणी
- क्या सोवत ग़ाफ़िल चेत
- बारहमासा
- ब्याकुल बिरह दिवानी
- मेरे दरद की पीर कसक
- पूजा और सेवा कर घंट बजावे
- पंडित भल चारों वेद पढ़े
- प्रीतम प्रीति लगन मन फँसियाँ
- गवन गये तजि काया रे हंसा
- देखो दृष्ट पसार
- कोई नहिं अपना रे
- क्या फिरत है भुलाना
- सखी मोहि नींद न आवै री
- पिया दरस बिना
- नहिं लागत लाज मंहत को
- वेद पुरान सब झूठ का खेल है
- संत मता है सार
- मुशकिल हो, आसान जान
- गगन के गुमठ पर