शकेब जलाली (1934–1966) आधुनिक उर्दू के प्रसिद्ध शायर थे। उनका वास्तविक नाम सैयद हसन रिज़वी था और उनका जन्म जलाली, अलीगढ़ में हुआ था। कम उम्र में ही उन्होंने उर्दू ग़ज़ल में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
उनकी प्रमुख कृति ‘रौशनी ऐ रौशनी’ है, जो उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई। उनकी शायरी में अकेलापन, जीवन की विडंबना, स्मृति और गहरी मानवीय संवेदना के साथ आधुनिक बिंबों का अनूठा प्रयोग मिलता है।
कम समय के साहित्यिक जीवन के बावजूद उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को नया और आधुनिक लहजा दिया। ‘आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो-चार गिरे’ और ‘आज इक और बरस बीत गया उसके बग़ैर’ उनके चर्चित कलाम में शामिल हैं।
शकेब जलाली की प्रमुख ग़ज़लें एवं कलाम
- आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे
- जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है
- जाती है धूप उजले परों को समेट के
- मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख
- कोई इस दिल का हाल क्या जाने
- हम-जिंस अगर मिले न कोई आसमान पर
- बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका
- साहिल तमाम अश्क-ए-नदामत से अट गया
- मैं शाख़ से उड़ा था सितारों की आस में
- आग के दरमियान से निकला
- दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर
- मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा
- मरीज़-ए-ग़म के सहारो कोई तो बात करो
- फिर सुन रहा हूँ गुज़रे ज़माने की चाप को
- ख़मोशी बोल उठ्ठे हर नज़र पैग़ाम हो जाए
- वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत
- दश्त ओ सहरा अगर बसाए हैं
- ग़म-ए-दिल हीता-ए-तहरीर में आता ही नहीं
- कनार-ए-आब खड़ा ख़ुद से कह रहा है कोई
- क्या जानिए मंज़िल है कहाँ जाते हैं किस सम्त
- दुनिया वालों ने चाहत का मुझ को सिला अनमोल दिया
- नक़ाब-ए-रुख़ उठाया जा रहा है
- दिल के वीराने में इक फूल खिला रहता है
- दोस्ती का फ़रेब ही खाएँ
- आया है हर चढ़ाई के बा'द इक उतार भी
- वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ शकेब जलाली की ग़ज़लें हैं — ‘आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे’, ‘जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है’, ‘जाती है धूप उजले परों को समेट के’, ‘मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।