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शकेब जलाली की ग़ज़लें: Shakeb Jalali Ghazal in Hindi

2026-09-09 · ग़ज़ल / Ghazal / शायरी / Shayari

शकेब जलाली (1934–1966) आधुनिक उर्दू के प्रसिद्ध शायर थे। उनका वास्तविक नाम सैयद हसन रिज़वी था और उनका जन्म जलाली, अलीगढ़ में हुआ था। कम उम्र में ही उन्होंने उर्दू ग़ज़ल में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
उनकी प्रमुख कृति ‘रौशनी ऐ रौशनी’ है, जो उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई। उनकी शायरी में अकेलापन, जीवन की विडंबना, स्मृति और गहरी मानवीय संवेदना के साथ आधुनिक बिंबों का अनूठा प्रयोग मिलता है।
कम समय के साहित्यिक जीवन के बावजूद उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को नया और आधुनिक लहजा दिया। ‘आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो-चार गिरे’ और ‘आज इक और बरस बीत गया उसके बग़ैर’ उनके चर्चित कलाम में शामिल हैं।

शकेब जलाली की प्रमुख ग़ज़लें एवं कलाम

इस पन्ने की ग़ज़लें

यहाँ शकेब जलाली की ग़ज़लें हैं — ‘आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे’, ‘जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है’, ‘जाती है धूप उजले परों को समेट के’, ‘मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।

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