निरंजनी संप्रदाय से जुड़े सेवादास रहस्यवादी संत-कवि थे। उनके जीवनकाल और व्यक्तिगत जीवन के बारे में बहुत अधिक प्रमाणिक सामग्री उपलब्ध नहीं है, इसलिए उनका साहित्य ही उनके विचार-जगत को समझने का प्रमुख आधार बनता है। उपलब्ध रचनाओं में गुरु, ज्ञान, साधना और मन की अवस्था से जुड़े प्रश्न प्रमुखता से आते हैं।
सेवादास के चार सबद उपलब्ध हैं। ‘कोई गुर बिन ग्यान न पावै रे’ में वे गुरु को आध्यात्मिक ज्ञान का आधार मानते हैं, जबकि ‘अब मन की दुबध्या भई दूरि’ में साधना से उत्पन्न आंतरिक परिवर्तन की ओर संकेत मिलता है। उनकी कुंडलियों में माया, सुमिरन, सतगुरु और संसार की मोह-माया जैसे विषयों पर विचार किया गया है। इस तरह सेवादास की वाणी निर्गुण संत परंपरा और निरंजनी साधना-पद्धति से जुड़े आध्यात्मिक चिंतन का परिचय देती है।