परिचय
परम संत शिवदयाल सिंह जी (1818–1878), जिन्हें श्रद्धालु 'स्वामी जी महाराज' के नाम से जानते हैं, राधास्वामी मत के प्रवर्तक एवं उन्नीसवीं सदी के महान आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे। आगरा में जन्में स्वामी जी महाराज ने लंबे एकांत साधना के बाद 1861 में बसंत पंचमी के दिन सार्वजनिक सत्संग का शुभारंभ किया। उन्होंने 'सुरत-शब्द योग' को आत्मा के आंतरिक उत्थान और ईश्वर साक्षात्कार का सबसे सहज मार्ग बताया। उनकी अनमोल आध्यात्मिक शिक्षाएँ एवं भजन 'सार बचन' (गद्य और पद्य) में संकलित हैं, जो गुरु-भक्ति और नाम-सुमिरन की प्रेरणा देती हैं।
संत शिवदयाल सिंह (स्वामी जी महाराज) के प्रमुख सबद
- घर आग लगावे सखी / शिवदयाल सिंह
- चूनर मेरी मैली भई / शिवदयाल सिंह
- प्रेमी सुनो प्रेम की बात / शिवदयाल सिंह
- मुरलिया बाज रही / शिवदयाल सिंह
- धुन-धुन डालूँ अब मन को / शिवदयाल सिंह
- सोता मन कस जागे भाई / शिवदयाल सिंह
- देव री सखी मोहिं उमंग बधाई / शिवदयाल सिंह
- गुरु घाट चलो मन भाई / शिवदयाल सिंह
- गुरु प्यारे का शब्द सुनो / शिवदयाल सिंह
- अतोला तेरी कर न सके कोइ तोल / शिवदयाल सिंह
- गुरु बिना कभी न उतरे पार / शिवदयाल सिंह
- कामना जग की तज मन यार / शिवदयाल सिंह
- गुरु प्यारे के चरनों की हो जा धूर / शिवदयाल सिंह
- गुरु प्यारे की प्रीत प्यारी हिरदे धार / शिवदयाल सिंह
- सुरतिया सोग भरी / शिवदयाल सिंह
- चलो घर गुरु संग घर मन धीर / शिवदयाल सिंह
- त्याग दे प्यारी जग ब्योहार / शिवदयाल सिंह
- मगन हुआ मन गुरु भगती धार / शिवदयाल सिंह
- घट भीतर तू जाग री / शिवदयाल सिंह
- गुरु प्यारे की प्यारी कर परतीत / शिवदयाल सिंह
- सुरत पनिहारी सतगुरु प्यारी / शिवदयाल सिंह
- उमंग मन गुरु चरनन में लाग / शिवदयाल सिंह
- सुरत लाई आरत सरधा धार / शिवदयाल सिंह
- सुरत लगी गुरु चरनन चित जोड़ / शिवदयाल सिंह
- गूजरी चली भरन गगरी / शिवदयाल सिंह
- गुरु प्यारे का ले तू नाम सम्हार / शिवदयाल सिंह
- भाव घर गुरु सन्मुख आई / शिवदयाल सिंह